Thursday, September 10, 2026
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न्यायपालिका बनाम ‘आप’: केजरीवाल और सिसोदिया के बाद दुर्गेश पाठक ने भी छोड़ी जस्टिस स्वर्णकांता की कोर्ट, लिखा पत्र

न्यायपालिका बनाम ‘आप’: केजरीवाल और सिसोदिया के बाद दुर्गेश पाठक ने भी छोड़ी जस्टिस स्वर्णकांता की कोर्ट, लिखा पत्र

​नई दिल्ली | दिल्ली के कथित आबकारी नीति मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) और न्यायपालिका के बीच टकराव अब एक नए मोड़ पर आ गया है। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे चुके अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के बाद अब पार्टी के एक और दिग्गज नेता और पूर्व विधायक दुर्गेश पाठक ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर उनकी अदालत की कार्यवाही में शामिल होने से इनकार कर दिया है।

​दुर्गेश पाठक का रुख: “न मैं आऊंगा, न मेरा वकील”

​दुर्गेश पाठक ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि वह इस मामले में जस्टिस स्वर्णकांता की अदालत के समक्ष पेश होने में असमर्थ हैं। उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा:

​”मेरी तरफ से कोई वकील भी अदालत में पेश नहीं होगा। मैं पूरी मजबूती के साथ अरविंद केजरीवाल के साथ खड़ा हूं।”

​यह कदम ‘आप’ नेताओं द्वारा अपनाई जा रही उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसे वे ‘सत्याग्रह’ का नाम दे रहे हैं।

​विवाद की जड़: क्या हैं आप नेताओं की आपत्तियां?

​आम आदमी पार्टी के नेताओं ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके विरोध के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

​1. हितों का टकराव (Conflict of Interest):

अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में हलफनामा दायर कर आरोप लगाया कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अधीन काम करते हैं। चूंकि इस मामले में तुषार मेहता सीबीआई (CBI) का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, इसलिए केजरीवाल का तर्क है कि जस्टिस शर्मा उनके खिलाफ आदेश पारित करने में सहज नहीं होंगी।

​2. वैचारिक झुकाव का आरोप:

केजरीवाल ने यह भी दावा किया कि जस्टिस शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े संगठन ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद’ के कार्यक्रमों में चार बार शामिल हो चुकी हैं। पार्टी का आरोप है कि इससे सुनवाई की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।

​3. आदेशों में एक खास ‘पैटर्न’:

‘आप’ नेताओं का तर्क है कि जस्टिस शर्मा के पिछले आदेशों में एक निश्चित पैटर्न नजर आता है, जहां जांच एजेंसियों (ED और CBI) के हर तर्क को बिना किसी ठोस आधार के स्वीकार कर लिया जाता है।

​सत्याग्रह या अदालत का बहिष्कार?

​इससे पहले 27 अप्रैल को अरविंद केजरीवाल ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक वीडियो संदेश जारी कर कहा था कि “गांधी जी के सिद्धांतों और सत्याग्रह की भावना के साथ, मैंने फैसला किया है कि मैं इस केस में उनके (जस्टिस शर्मा) सामने पेश नहीं होऊंगा।” ठीक एक दिन बाद मनीष सिसोदिया ने भी इसी तरह की चिट्ठी लिखकर अदालत में पेश होने से मना कर दिया था।

​मामले की पृष्ठभूमि

​गौरतलब है कि राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। हालांकि, सीबीआई ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद यह मामला जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच के पास पहुंचा। केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा से खुद को इस केस से अलग करने (Recuse) की मांग की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था।

​अब दुर्गेश पाठक के इस नए पत्र ने दिल्ली की राजनीति और कानूनी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। देखना यह होगा कि अदालत इस सामूहिक ‘बहिष्कार’ पर क्या कड़ा रुख अपनाती है।

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