UKSSSC पेपर लीक: छात्रों का धरना-प्रदर्शन, CBI जांच की मांग और नेताओं की श्रेय लूट… आखिर हर चीज में राजनीति क्यों?
UKSSSC पेपर लीक: छात्रों का धरना-प्रदर्शन, CBI जांच की मांग और नेताओं की श्रेय लूट… आखिर हर चीज में राजनीति क्यों?
उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की ग्रेजुएट लेवल परीक्षा के पेपर लीक ने न सिर्फ हजारों युवाओं के सपनों को झकझोर दिया है, बल्कि राज्य की राजनीति को भी नई आग दे दी है। 21 सितंबर को हुई परीक्षा के महज 30-35 मिनट बाद ही तीन पेजों का पेपर सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। छात्रों का आठ दिनों तक चला धरना-प्रदर्शन आखिरकार सोमवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के CBI जांच की सिफारिश के ऐलान पर समाप्त हो गया।
लेकिन, जहां छात्र अपनी जीत का जश्न मना रहे हैं, वहीं राजनीतिक दलों में श्रेय लेने की होड़ लग गई है। कांग्रेस, AAP और यहां तक कि BJP के अंदरूनी गुटों ने इसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश शुरू कर दी। सवाल उठता है—क्या छात्रों का संघर्ष सिर्फ राजनीतिक लाभ का साधन बन गया? आखिर हर मुद्दे में राजनीति क्यों घुसेड़ी जाती है?
पेपर लीक का काला साया: कैसे भड़का आक्रोश?
21 सितंबर को UKSSSC की ग्रेजुएट लेवल भर्ती परीक्षा शुरू होते ही हड़कंप मच गया। परीक्षा केंद्रों से बाहर लीक हुए पेपर के वायरल होने पर छात्रों ने इसे “सिस्टम की साजिश” करार दिया। मुख्य आरोपी खालिद मलिक (हरिद्वार) ने कथित तौर पर पेपर की फोटो खींचकर अपनी बहन सबिया को भेजी, जो आगे बेची गई। गिरफ्तारियों में पूर्व मास्टरमाइंड हाकम सिंह रावत (2021 लीक केस का आरोपी) का नाम भी सामने आया, जो 12-15 लाख रुपये लेकर नकल करवाता था।
UKSSSC चेयरमैन गणेश सिंह मार्टोलिया ने इसे “व्यक्तिगत धोखाधड़ी” बताकर कमतर करने की कोशिश की, लेकिन छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा। देहरादून के परेड ग्राउंड पर धरना शुरू हुआ, जो पूरे राज्य में फैल गया—पिथौरागढ़ में BJP ब्लॉक प्रमुख का घेराव, हल्द्वानी में सड़क जाम, श्रीनगर गढ़वाल और हरिद्वार में प्रदर्शन। नारों में गूंजा—”पेपर चोर, गद्दी छोड़!” छात्र संगठनों (बेरोजगार यूनियन, स्वाभिमान मोर्चा) ने परीक्षा रद्द, चेयरमैन का इस्तीफा और CBI जांच की मांग की। X पर #UKSSSCPaperLeak और #CBIProbeUKSSSC ट्रेंड करते रहे।
यह पहला मामला नहीं। 2021 में भी UKSSSC की कई परीक्षाएं रद्द हुईं, और राज्य में भर्ती घोटालों का सिलसिला जारी है। छात्रों का कहना है, “हमारी मेहनत बर्बाद हो रही है, लेकिन सिस्टम में भ्रष्टाचार बरकरार है।”
सरकार का रुख: SIT से CBI तक का सफर
सरकार ने शुरुआत में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) गठित की, जिसकी निगरानी रिटायर्ड हाईकोर्ट जज बीएस वर्मा को सौंपी गई। दो पुलिसकर्मी, एक शिक्षक (सुमन) सस्पेंड हुए, और बुलडोजर से आरोपियों की संपत्तियां तोड़ी गईं। CM धामी ने इसे “नकल जिहाद” करार दिया, जो विवादास्पद रहा। लेकिन प्रदर्शन थमे नहीं। 29 सितंबर को धामी ने परेड ग्राउंड जाकर छात्रों से मुलाकात की। उन्होंने कहा, “तुम्हारे सपने टूटने नहीं दूंगा। SIT चल रही है, लेकिन तुम CBI चाहते हो तो हम सिफारिश करेंगे।”
इसके बाद आठ दिनों का धरना समाप्त हो गया। छात्रों ने जश्न मनाया, और X पर वीडियो वायरल हुए जहां लोग धामी के ऐलान पर पटाखे फोड़ते नजर आए। धामी ने 25,000 साफ भर्तियों का दावा किया और केस वापसी का वादा किया।
श्रेय लेने की होड़: राजनीति का कड़वा सच
CBI सिफारिश से जहां युवाओं में राहत की लहर दौड़ी, वहीं राजनीतिक दलों ने इसे अपना “क्रेडिट” बनाने की होड़ मचा ली। BJP ने कहा, “यह हमारी लगातार मांग का नतीजा है। पूर्व CM त्रिवेंद्र सिंह रावत जैसे BJP नेता सरकार को घेरे, “पहले सख्ती क्यों नहीं?” कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने 26 सितंबर को राज्यव्यापी धरना दिया, CBI की मांग की और BJP नेताओं पर “नकल जिहाद” का आरोप लगाया। पूर्व CM हरीश रावत ने कहा, “जांच जड़ तक जाए।”
AAP नेता अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर तंज कसा, “BJP शासित केंद्र, उत्तराखंड और गुजरात में पेपर लीक की एक ही कहानी।” X पर पोस्ट्स में लिखा गया, “छात्रों की जीत है, लेकिन नेता इसे अपना श्रेय बना रहे।” एक यूजर ने कहा, “यह मूवमेंट ने साफ कर दिया कि पहाड़ के सच्चे साथी कौन हैं।”
आखिर हर चीज में राजनीति क्यों? एक कड़वी हकीकत
यह घटना उत्तराखंड के भर्ती सिस्टम की पोल खोलती है, लेकिन इससे बड़ा सवाल है—क्यों हर मुद्दा राजनीतिक रंग ले लेता है? छात्रों का संघर्ष साफ-सुथरी नौकरी का है, लेकिन नेता इसे वोटबैंक के लिए इस्तेमाल करते हैं। SIT को “कवर-अप” बताकर CBI की मांग करना जायज था, लेकिन अब श्रेय की जंग में छात्रों की पीड़ा भुला दी जा रही है।
विशेषज्ञ कहते हैं, “राजनीति लोकतंत्र का आईना है, लेकिन जब यह अवसरवादिता बन जाए, तो जनता का विश्वास टूटता है।” राज्य में बेरोजगारी 7% से ऊपर है, और ऐसे घोटाले युवाओं को हताश करते हैं।
आगे क्या? उम्मीदों की किरण या पुरानी कहानी?
CBI जांच की सिफारिश के बाद SIT की रिपोर्ट एक महीने में आएगी। छात्र परीक्षा रद्दीकरण का इंतजार कर रहे हैं। धामी सरकार का “जीरो टॉलरेंस” दावा परीक्षा की घड़ी लेगा। लेकिन X पर ट्रेंडिंग #JusticeForUKSSSC से साफ है—युवा सतर्क हैं। यह समय है कि राजनीति सेवा का माध्यम बने, न कि बाधा। अन्यथा, अगला आंदोलन और बड़ा होगा।
क्या आपको लगता है CBI से न्याय मिलेगा, या यह भी राजनीतिक ड्रामा साबित होगा? अपनी राय साझा करें!
