गौमुख से यमुनोत्री: नदियों और समुदायों की सुरक्षा के लिए हिमालय नीति की पुकार
हिमालय की गोद में बसी पवित्र नदियों गंगा और यमुना के उद्गम स्थल गौमुख से यमुनोत्री तक फैले क्षेत्र में पर्यावरणीय संकट गहरा रहा है। विशेषज्ञों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय समुदायों ने केंद्र सरकार से एक व्यापक ‘हिमालय नीति’ (Himalaya Policy) की मांग की है, जो नदियों के प्रवाह, ग्लेशियरों की रक्षा और हिमालयवासियों की आजीविका को सुनिश्चित करे। यह मांग हाल की हिमालयी बाढ़ों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बाद तेज हो गई है, जहां ग्लेशियर पिघलने, भूस्खलन और बाढ़ से हजारों लोग प्रभावित हो चुके हैं। चार धाम यात्रा मार्ग पर चल रहे बड़े पैमाने के निर्माण कार्यों, जैसे चार धाम राजमार्ग और रेलवे प्रोजेक्ट, ने इस संकट को और बढ़ा दिया है।
उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2017 के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, हिमालय के ग्लेशियर, नदियां, झीलें, जंगल और वनस्पतियां को ‘कानूनी व्यक्ति’ (Legal Person) का दर्जा दिया गया था, ताकि इन्हें प्रदूषण और विनाश से बचाया जा सके। इसमें गंगोत्री और यमुनोत्री ग्लेशियर, गंगा-यमुना नदियां, हवा, घास के मैदान और जंगल शामिल हैं। लेकिन सात वर्ष बाद भी इस फैसले का प्रभावी कार्यान्वयन नहीं हो सका। पर्यावरणविद वंदना शिवा ने 2013 की उत्तराखंड आपदा का हवाला देते हुए कहा कि अनियोजित बांध निर्माण, सुरंगें और विस्फोटक उपयोग से भूस्खलन बढ़े हैं, जो नदियों के प्रवाह को बाधित कर रहे हैं। हाल की हिमालयी बाढ़ों में सड़कें, पुल और बिजली लाइनें ध्वस्त हो गईं, जिससे पूरा क्षेत्र कट गया। पॉलिसी सर्कल की रिपोर्ट के अनुसार, ग्लेशियरों का 30 प्रतिशत हिस्सा इस शताब्दी में पिघल सकता है, जो बाढ़ और सूखे का कारण बनेगा।
गौमुख (गंगोत्री ग्लेशियर, 3,900 मीटर ऊंचाई) से यमुनोत्री (यमुना का उद्गम) तक का यह क्षेत्र भारत की जल सुरक्षा का केंद्र है। गंगा प्रणाली यहां से निकलती है, जो देश की 40 प्रतिशत आबादी को पानी और आजीविका प्रदान करती है। लेकिन चार धाम प्रोजेक्ट (केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री) के तहत 900 किलोमीटर लंबी सड़क और 75,000 करोड़ की रेल परियोजना से वनों की कटाई, नदियों में कचरा और भूस्खलन बढ़े हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि विकास को नदियों के प्रवाह के विरुद्ध नहीं होना चाहिए। हिमाचल प्रदेश में 2019 के धरने में 100 से अधिक कार्यकर्ताओं ने मांग की कि बिना नीति के हिमालयी नदियों को बचाना असंभव है। हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में शहरीकरण से जल असुरक्षा बढ़ रही है, जहां नदियां ग्लेशियरों पर निर्भर हैं।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि हिमालय नीति में नो-बिल्ड जोन, भूस्खलन जोनिंग, बांधों के लिए फ्लड रूल कर्व्स और रीयल-टाइम डैशबोर्ड शामिल हों। केंद्र से राज्यों को सहायता ऐसी शर्तों पर दी जाए जो ड्रेनेज और ढलान संरक्षण पर जोर दें। रिन्यूएबल एनर्जी शेड्यूलिंग को बांध सुरक्षा से जोड़ा जाए। पर्यावरण कार्यकर्ता कहते हैं कि बिना नीतिगत बदलाव के हिमालयी नदियां और लोग खतरे में रहेंगे। चार धाम यात्रा को पर्यटन का नाम देकर व्यावसायिक बनाना पवित्रता को नुकसान पहुंचा रहा है।
सरकार को अब तत्काल हिमालय नीति लागू करनी चाहिए, जिसमें ग्लेशियर संरक्षण, वनरोपण और अवैध लॉगिंग पर सख्त कानून शामिल हों। स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ही सतत विकास संभव है। यह मांग न केवल पर्यावरण बचाव की है, बल्कि भारत की जल सुरक्षा और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा की है।
