ब्रिटेन में अप्रवास और मुस्लिम आबादी को लेकर तनाव: हिंसक दंगों ने मचाया हड़कंप
लंदन, 15 सितंबर 2025: ब्रिटेन में अप्रवासियों और मुस्लिम आबादी के खिलाफ बढ़ते आक्रोश ने देश को एक बार फिर उबाल पर ला दिया है। जुलाई 2025 से शुरू हुए एंटी-इमिग्रेशन प्रोटेस्ट, जो अब हिंसक दंगों में बदल चुके हैं, ने पूरे यूरोप को चिंतित कर दिया है। कम से कम 40 पुलिसकर्मी घायल हो चुके हैं और 140 से अधिक गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। फार-राइट ग्रुप्स जैसे ब्रिटेन फर्स्ट, होमलैंड पार्टी और पैट्रियोटिक अल्टरनेटिव इन प्रदर्शनों को संगठित कर रहे हैं, जबकि सोशल मीडिया पर गलत सूचनाओं का प्रसार तनाव को भड़का रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सब बढ़ती मुस्लिम आबादी और अनियंत्रित अप्रवासन की धारणा से उपजा है।
यह विवाद 13 जुलाई 2025 को साउथपोर्ट में हुए एक चाकू हमले से भड़का, जिसमें तीन लड़कियां मारी गईं। सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलीं कि हमलावर मुस्लिम अप्रवासी था, हालांकि यह गलत साबित हुआ। इससे फार-राइट एक्टिविस्ट्स ने राष्ट्रव्यापी विरोध का आह्वान किया। प्रदर्शनकारियों ने एशियाई, ब्लैक और मुस्लिम समुदायों पर हमले किए, मस्जिदों, दुकानों और लाइब्रेरी जैसी इमारतों को निशाना बनाया। मैनचेस्टर, लिवरपूल, नॉटिंघम और रोदरहैम जैसे शहरों में हिंसा फैली। एक होटल में शरणार्थियों पर हमला कर खिड़कियां तोड़ी गईं और आग लगाई गई। X (पूर्व ट्विटर) पर टॉमी रॉबिन्सन जैसे प्रभावशाली अकाउंट्स ने इन अफवाहों को फैलाया, जिससे दंगे भड़के।
ब्रिटेन में मुस्लिम आबादी का तेजी से बढ़ना इस गुस्से का मुख्य कारण है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से मुस्लिम जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, जो अब इंग्लैंड और वेल्स में लगभग 6-7% है। आप्रवासन, उच्च जन्म दर और कुछ रूपांतरण इसके पीछे हैं। 2010-2016 के बीच यूरोप में मुस्लिम अनुपात 3.8% से 4.9% हो गया, और 2050 तक यह 7.4% तक पहुंच सकता है, भले ही आप्रवासन रुक जाए। एक युगॉव पोल में 41% ब्रिटिश लोगों ने कहा कि मुस्लिम अप्रवासी यूके पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, जबकि 49% का मानना है कि मुस्लिम महिलाओं को हिजाब पहनने के लिए दबाव डाला जाता है। 31% ने इस्लाम को हिंसा को बढ़ावा देने वाला बताया। ये आंकड़े ईसाई (7%) या यहूदी (13%) समुदायों के मुकाबले कहीं अधिक हैं। रिफॉर्म यूके जैसी पार्टियां, जो इस्लामोफोबिया और एंटी-इमिग्रेंट रेटोरिक पर आधारित हैं, लोकप्रिय हो रही हैं। नाइजेल फराज जैसे नेता मुसलमानों को “पांचवीं कॉलम” बताते हैं।
राजनीतिक रूप से, ब्रेक्सिट के बाद सीमा नियंत्रण की विफलता ने असंतोष बढ़ाया है। लेबर और कंजर्वेटिव दोनों सरकारों पर मुसलमानों को बदनाम करने का आरोप है। गाजा युद्ध के बाद एंटी-मुस्लिम हेट क्राइम तीन गुना बढ़े। X पर एलन मस्क जैसे प्रभावशाली लोगों के पोस्ट्स ने भी आग में घी डाला है। मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन की सेक्रेटरी-जनरल जारा मोहम्मद ने कहा, “यह ब्रिटेन का प्रतिनिधित्व नहीं करता, लेकिन हमें इमिग्रेशन पॉलिसी की समीक्षा करनी होगी।” काउंटर-प्रोटेस्ट्स में हजारों ने एंटी-रैसिज्म का समर्थन किया, लेकिन मुसलमानों में डर व्याप्त है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह एथ्नो-रिलिजियस विभाजन ब्रिटिश नागरिकता की नींव को हिला रहा है। सरकार को आर्थिक अप्रवासन सीमित कर शरणार्थियों के लिए बेहतर नीति बनानी होगी। अन्यथा, यह तनाव और बढ़ेगा। ब्रिटेन की उदारता अब कमजोरी बन रही है, और सामाजिक एकता खतरे में है।
