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मालेगांव ब्लास्ट: प्रज्ञा ठाकुर समेत 7 आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ बॉम्बे HC में अपील

मालेगांव ब्लास्ट: प्रज्ञा ठाकुर समेत 7 आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ बॉम्बे HC में अपील

2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में छह पीड़ित परिवारों ने पूर्व BJP सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सात आरोपियों को बरी करने के विशेष NIA कोर्ट के फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी है। 8 सितंबर 2025 को निसार अहमद सैयद बिलाल और पांच अन्य पीड़ितों ने वकील मतीन शेख के माध्यम से अपील दायर की, जिसमें विशेष कोर्ट के 31 जुलाई 2025 के फैसले को गलत और कानून के खिलाफ बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की गई है। अपील की सुनवाई जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस रंजीतसिंह आर. भोसले की डिवीजन बेंच के समक्ष 15 सितंबर को होने की संभावना है।

मालेगांव विस्फोट और मामला

29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव में एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल पर रखे गए विस्फोटक उपकरण में धमाका हुआ था, जिसमें 6 लोगों की मौत हुई और 101 अन्य घायल हुए। महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने प्रज्ञा ठाकुर, पुरोहित, मेजर (सेवानिवृत्त) रमेश उपाध्याय, अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी और समीर कुलकर्णी को गिरफ्तार किया था। ATS ने दावा किया था कि यह धमाका दक्षिणपंथी चरमपंथियों ने मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने के लिए किया था।

अपील में दलीलें

पीड़ितों ने अपील में कहा कि विशेष NIA कोर्ट का फैसला कानूनी और तथ्यात्मक रूप से गलत है। विशेष जज ए.के. लाहोटी ने अपने फैसले में कहा था कि “मात्र संदेह विश्वसनीय सबूत का स्थान नहीं ले सकता” और पर्याप्त सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अपील में तर्क दिया गया कि साजिश गुप्त रूप से रची जाती है, इसलिए इसके प्रत्यक्ष सबूत नहीं हो सकते। साथ ही, NIA की जांच पर सवाल उठाए गए, जिसमें पूर्व विशेष लोक अभियोजक रोहिणी सालियन ने दावा किया था कि उन पर मामले में नरमी बरतने का दबाव डाला गया था। अपील में यह भी कहा गया कि कोर्ट ने मोटरसाइकिल के प्रज्ञा ठाकुर से संबंध और RDX के पुरोहित द्वारा आपूर्ति के सबूतों को गलत तरीके से खारिज किया।

NIA और ATS की जांच पर विवाद

ATS ने 2008 में सात आरोपियों को गिरफ्तार कर एक बड़े षड्यंत्र का खुलासा किया था, जिसके बाद अल्पसंख्यक समुदाय के क्षेत्रों में कोई बड़ा धमाका नहीं हुआ। हालांकि, NIA ने 2011 में जांच अपने हाथ में लेने के बाद आरोपों को कमजोर करने का काम किया, जिसे अपील में “जांच में खामियां” और “लापरवाही” बताया गया है। अपील में यह भी कहा गया कि कोर्ट को निष्क्रिय “पोस्टमैन” की तरह काम करने के बजाय सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए थी।

आगे की राह

पीड़ित परिवारों ने मांग की है कि हाईकोर्ट विशेष कोर्ट के फैसले को रद्द कर आरोपियों को सजा दे। NIA ने अभी तक इस फैसले को चुनौती नहीं दी है। यह मामला 17 साल बाद भी चर्चा में है, क्योंकि यह देश में दक्षिणपंथी आतंकवाद से जुड़ा पहला बड़ा मामला था। अपील ने एक बार फिर जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

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