Friday, October 2, 2026
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दिल्ली-NCR में 1 अक्टूबर से लागू होगी ‘नो पीयूसी नो फ्यूल’ पॉलिसी, जांच के वैज्ञानिक दायरे पर उठे सवाल

दिल्ली-NCR में 1 अक्टूबर से लागू होगी ‘नो पीयूसी नो फ्यूल’ पॉलिसी, जांच के वैज्ञानिक दायरे पर उठे सवाल

​दिल्ली-NCR के 35 जिलों में कल यानी 1 अक्टूबर से ‘नो पीयूसी नो फ्यूल’ (No PUC No Fuel) नीति लागू होने जा रही है। इसके तहत यदि किसी वाहन के पास वैध प्रदूषण प्रमाणपत्र (PUC) नहीं है, तो उसे पेट्रोल पंपों पर ईंधन नहीं मिलेगा। इस अभियान को सख्ती से लागू करने के लिए अकेले दिल्ली के 500 से अधिक पेट्रोल पंपों को ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) कैमरों से लैस किया गया है। हालांकि, इस बीच यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या वैध PUC होना इस बात का पक्का सबूत है कि गाड़ी बिल्कुल प्रदूषण नहीं फैला रही है?

​PUC टेस्ट में किन तत्वों की होती है जांच?

इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन Transportation (ICCT) के इंडिया मैनेजिंग डायरेक्टर अमित भट्ट के अनुसार, मौजूदा PUC टेस्ट में सभी प्रदूषणकारी तत्वों की जांच नहीं होती:

​पेट्रोल, CNG और LPG गाड़ियां: इसमें केवल कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और हाइड्रोकार्बन (HC) के स्तर को मापा जाता है।

​डीजल गाड़ियां: इसमें केवल धुएं की अपारदर्शिता (Opacity) यानी एग्जॉस्ट से निकलने वाला धुआं रोशनी को कितना रोकता है, यह देखा जाता है।

​इनकी जांच नहीं होती: PUC टेस्ट में PM (पार्टिकुलेट मैटर), PN (पार्टिकल नंबर) और NOx (नाइट्रोजन ऑक्साइड्स) जैसे खतरनाक और बारीक कणों वाले प्रदूषण तत्वों की जांच होती ही नहीं, जो दिल्ली-NCR की खराब हवा के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं।

​वैध PUC के बाद भी गाड़ी फैला सकती है प्रदूषण

विशेषज्ञों का कहना है कि गाड़ी वैध PUC पास कर सकती है, लेकिन उससे तय सीमा से ज्यादा NOx या अन्य हानिकारक कण निकल सकते हैं, क्योंकि मौजूदा टेस्ट में ये चीजें मापी ही नहीं जातीं। सड़क पर गाड़ी से होने वाला प्रदूषण उसकी उम्र, रखरखाव, माइलेज, ड्राइविंग आदतों और लोड पर निर्भर करता है।

​ICCT की सर्वे रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे

ICCT ने दिल्ली और गुरुग्राम में 20 जगहों पर 1 लाख से ज्यादा गाड़ियों की ऑन-रोड जांच की, जिसमें यह तथ्य सामने आए:

​BS-VI गाड़ियां: नई तकनीक वाली BS-VI प्राइवेट कारें काफी हद तक साफ पाई गईं।

​कमर्शियल गाड़ियों का हाल: BS-VI टैक्सियों और हल्के सामान ढोने वाले वाहनों (LCV) से प्राइवेट कारों के मुकाबले क्रमशः 2.4 गुना और 5 गुना ज्यादा NOx (नाइट्रोजन ऑक्साइड) निकला।

​CNG गाड़ियों का भ्रम: जांच में कुछ कैटेगरी की CNG गाड़ियों से भी काफी ज्यादा प्रदूषण निकलने की बात सामने आई, जिससे यह धारणा गलत साबित होती है कि CNG का मतलब हमेशा शून्य प्रदूषण होता है।

​डीजल वाहनों की टेस्टिंग पर सवाल

नई डीजल गाड़ियों में कालिख रोकने के लिए डीजल पार्टिकुलेट फिल्टर (DPF) का इस्तेमाल होता है, लेकिन पारंपरिक ओपैसिटी टेस्ट यह नहीं बता पाता कि एडवांस्ड कंट्रोल सिस्टम ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं। यूरोपीय आयोग का भी मानना है कि यदि DPF खराब या उससे छेड़छाड़ की गई हो, तब भी वाहन ओपैसिटी टेस्ट पास कर सकते हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ अब PUC टेस्टिंग के दौरान आधुनिक पार्टिकल नंबर (PN) टेस्टिंग और डैशबोर्ड पर मिलने वाली खराबी की चेतावनियों (Warning Lights) पर ध्यान देने की वकालत कर रहे हैं।

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