न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का बड़ा संदेश: ‘विविधता प्रकृति का नियम, एकता परम सत्य’, पर्यावरण संरक्षण पर भी दिया जोर
न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का बड़ा संदेश: ‘विविधता प्रकृति का नियम, एकता परम सत्य’, पर्यावरण संरक्षण पर भी दिया जोर
न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस’ महासम्मेलन में 30 देशों के 200 से अधिक धर्मगुरुओं और प्रतिनिधियों ने नफरत व हिंसा के खिलाफ एकजुटता का संदेश दिया। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी सम्मेलन को संबोधित करते हुए धार्मिक सद्भाव, मानवता और पर्यावरण संरक्षण को लेकर अपने विचार रखे।
धर्म के नाम पर हिंसा स्वीकार नहीं
अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस’ यानी ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ महासम्मेलन में दुनिया के अलग-अलग देशों से आए धर्मगुरुओं और प्रतिनिधियों ने शांति और भाईचारे को लेकर महत्वपूर्ण संकल्प लिया। सम्मेलन में धर्म के नाम पर नफरत, हिंसा और विभाजन को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया गया।
सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त घोषणापत्र में कहा गया कि आस्था का इस्तेमाल लोगों को जोड़ने और समाज के घाव भरने के लिए होना चाहिए, न कि हिंसा या नफरत को सही ठहराने के लिए। प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि एकता का अर्थ सभी का एक जैसा होना नहीं है। अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के बावजूद आपसी सम्मान के साथ साथ रहा जा सकता है।
राखी बांधकर दिया एकता और भाईचारे का संदेश
महासम्मेलन में विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों ने एक-दूसरे को रक्षासूत्र यानी राखी बांधी। इसके जरिए आपसी देखभाल, सुरक्षा और वैश्विक जिम्मेदारी का संदेश दिया गया।
सम्मेलन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल माध्यमों के जरिए फैलने वाली नफरत को लेकर भी चिंता जताई गई। धर्मगुरुओं ने तकनीक के इस्तेमाल को मानवीय गरिमा, सत्य और समाज की भलाई से जोड़ने की अपील की।
मोहन भागवत बोले- ‘विविधता प्रकृति का नियम, एकता परम सत्य’
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरी ताकत के साथ इस अंतर-धार्मिक पहल के साथ खड़ा है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग धर्म एक ही अंतिम सत्य तक पहुंचने के अलग-अलग रास्ते हैं।
भागवत के मुताबिक, विविधता प्रकृति का नियम है और यह हमारी आंतरिक एकता की सुंदरता है। इसलिए अलग-अलग मान्यताओं और पहचान का सम्मान करना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
‘भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए तो वह सच्चा हिंदू नहीं’
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में 2018 के संवाद का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वह सच्चा हिंदू नहीं है।
उन्होंने कहा कि भारत में मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ संवाद लगातार जारी है और इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है।
राजनीति नहीं, समाज से निकलेगा समाधान
संघ प्रमुख ने दुनिया में शांति और विश्वास बहाल करने के लिए सामाजिक स्तर पर प्रयासों की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि केवल राजनीति के जरिए दुनिया की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि राजनीति में कई बार स्वार्थ हावी हो जाता है।
उन्होंने अंतर-धार्मिक संवाद, निस्वार्थ सेवा और स्थानीय स्तर पर लोगों के बीच मजबूत संबंध बनाने पर जोर दिया। उनके मुताबिक, जब समाज में व्यापक सहमति बनती है तो नीतियां भी उसी दिशा में आगे बढ़ती हैं।
पर्यावरण संरक्षण पर भी मोहन भागवत का जोर
महासम्मेलन में मोहन भागवत ने पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की जरूरत पर भी बात की। उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण को अक्सर एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य के रूप में देखा जाता है, जबकि ऐसा होना जरूरी नहीं है।
उन्होंने कहा कि दुनिया को ऐसे विकास मॉडल की जरूरत है जिसमें प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना इंसान समृद्ध हो सके। भागवत ने भारतीय सभ्यतागत सोच का उल्लेख करते हुए कहा कि मानव जीवन के केंद्र में जिम्मेदारी की भावना होनी चाहिए।
‘हम प्रकृति से जुड़े हैं’
मोहन भागवत ने कहा कि इंसान प्रकृति से अलग नहीं है। हमें अपने हर काम के प्रभाव के बारे में सोचना चाहिए कि उससे केवल हमारा ही नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति का भी कल्याण हो।
उन्होंने कहा कि इंसान को अपनी बुद्धि का इस्तेमाल प्रकृति पर कब्जा करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन के दूसरे रूपों की रक्षा करने के लिए करना चाहिए।
खाद्य श्रृंखला का उदाहरण देकर समझाई जिम्मेदारी
भागवत ने इंसानों के बढ़ते प्रभाव का उदाहरण देते हुए कहा कि मानव सभ्यता के विकास के साथ प्रकृति पर दबाव भी बढ़ा है। उन्होंने कहा कि इंसान के पास सोचने-समझने और सही-गलत का निर्णय लेने की क्षमता है, इसलिए दुनिया और प्रकृति की रक्षा करना उसकी जिम्मेदारी है।
उन्होंने लोगों से केवल दूसरों को जीने देने की सोच से आगे बढ़कर दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने में योगदान देने की अपील की।
‘खुद भी जिएं और दूसरों को भी जीने में मदद करें’
भागवत ने कहा कि समाज को इस तरह आगे बढ़ना चाहिए कि एक व्यक्ति का जीवन दूसरे के जीवन के लिए सहारा बने। उन्होंने आपसी सहयोग और जिम्मेदारी को मानवता के भविष्य के लिए जरूरी बताया।
उन्होंने कहा कि बड़े बदलाव का इंतजार करने के बजाय रोजमर्रा के जीवन में छोटे-छोटे बदलावों से इसकी शुरुआत की जा सकती है।
‘पंच परिवर्तन’ का भी किया जिक्र
आरएसएस प्रमुख ने अपने संबोधन में संघ के ‘पंच परिवर्तन’ कार्यक्रम का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन सिद्धांतों को सबसे पहले व्यक्ति को अपने जीवन में अपनाना होगा और फिर इन्हें समाज तक पहुंचाना होगा।
भागवत के अनुसार, मानवता, पर्यावरण और समूची सृष्टि के संरक्षण के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामाजिक सहयोग बेहद जरूरी है।
