राजनीति

बीजेपी-अकाली गठबंधन की अटकलें: पंजाब में AAP-कांग्रेस के लिए कितना बड़ा खतरा?

बीजेपी-अकाली गठबंधन की अटकलें: पंजाब में AAP-कांग्रेस के लिए कितना बड़ा खतरा?

चंडीगढ़। पंजाब की राजनीति में एक बार फिर पुरानी दोस्ती की चर्चा जोर पकड़ रही है। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हालिया मुलाकात के बाद बीजेपी और अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन की अटकलें तेज हो गई हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह सवाल उठ रहा है कि क्या दोनों दलों का साथ आना सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) और मुख्य विपक्षी कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकता है। आंकड़ों के आईने में देखें तो जवाब साफ है—यह गठबंधन चुनावी समीकरण को बदल सकता है।

पुराना गठबंधन, नई मजबूरी

बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन 1997 से 2020 तक करीब 23 साल चला। इस दौरान दोनों ने 1997, 2007 और 2012 में सत्ता साझा की। 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर रिश्ता टूटा। इसके बाद दोनों दलों ने 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव अलग-अलग लड़े। नतीजा दोनों के लिए निराशाजनक रहा।

2022 विधानसभा चुनाव में AAP ने 92 सीटें जीतीं (42 प्रतिशत वोट शेयर)। कांग्रेस 18 सीटों (करीब 23 प्रतिशत) पर सिमट गई। अकाली दल को सिर्फ 3 सीटें (18.38 प्रतिशत वोट) मिलीं, जबकि बीजेपी को 2 सीटें (6.6 प्रतिशत वोट)। 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 7, AAP ने 3, अकाली ने 1 सीट जीती। बीजेपी का वोट शेयर बढ़कर 18.6 प्रतिशत हो गया, लेकिन सीट शून्य रही। अकाली का वोट शेयर 13.5 प्रतिशत के आसपास रहा।

आंकड़े क्या कहते हैं?

अगर दोनों दल 2027 में साथ आते हैं तो शहरी हिंदू वोट (बीजेपी का आधार) और ग्रामीण-पंथक सिख वोट (अकाली का पारंपरिक आधार) एक जगह जुड़ सकते हैं। हाल के नगर निकाय चुनावों में अकाली दल को शहरी इलाकों में करीब 9 प्रतिशत और अर्ध-शहरी में 11 प्रतिशत वोट मिले। बीजेपी का शहरी वोट बैंक पहले से मजबूत है। दोनों के संयुक्त वोट शेयर का अनुमान 25-28 प्रतिशत या उससे अधिक लगाया जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अकेले लड़ने पर दोनों तीसरे-चौथे स्थान पर सिमट सकते हैं। साथ आने पर वे AAP और कांग्रेस के खिलाफ सीधा मुकाबला खड़ा कर सकते हैं। खासकर मालवा और माझा क्षेत्र में यह समीकरण असरदार साबित हो सकता है। AAP के खिलाफ बढ़ते एंटी-इंकम्बेंसी, कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच विपक्षी वोटों का एक होना सत्ताधारी दल के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है।

AAP और कांग्रेस की बेचैनी

AAP नेताओं ने सुखबीर-मोदी मुलाकात को राजनीतिक अवसरवाद बताते हुए कहा कि अकाली दल अपनी राजनीतिक मजबूरी में बीजेपी के करीब आ रहा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वरिंग ने भी अकाली दल पर उलटफेर का आरोप लगाया। दोनों दल इस बात से चिंतित दिख रहे हैं कि चार दलीय मुकाबला तीन दलीय हो सकता है, जिससे वोट बंटने का फायदा AAP को मिलने की संभावना कम हो जाएगी।

बीजेपी ने सार्वजनिक रूप से अब तक अकेले 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही है। लेकिन राज्य इकाई के कुछ नेता गठबंधन के पक्ष में हैं। अकाली दल के पास फिलहाल विधानसभा में सिर्फ 3 विधायक हैं। राजनीतिक अस्तित्व के लिए उसे सहयोग की जरूरत महसूस हो रही है।

चुनौतियां भी कम नहीं

गठबंधन आसान नहीं होगा। सीट बंटवारे पर मतभेद, कृषि कानूनों की याद, अकाली दल की कमजोर हुई साख और बीजेपी का स्वतंत्र विस्तार का लक्ष्य—ये सभी बाधाएं हैं। फिर भी, 2027 चुनाव से पहले यह चर्चा दोनों दलों को प्रासंगिक बनाए रखेगी और AAP-कांग्रेस को अपनी रणनीति दोबारा सोचने पर मजबूर करेगी।

आंकड़े बताते हैं कि अकेला मुकाबला दोनों के लिए नुकसानदेह है। साथ आने पर वे पंजाब की राजनीति में फिर से बड़े खिलाड़ी बन सकते हैं। अंतिम फैसला जनता का होगा, लेकिन समीकरण बदलने की संभावना अब नजरअंदाज नहीं की जा सकती।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *