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चुनावी जादूगर से विधायक तक… प्रशांत किशोर की कहानी अब असल जिंदगी का थ्रिलर बन गई

चुनावी जादूगर से विधायक तक… प्रशांत किशोर की कहानी अब असल जिंदगी का थ्रिलर बन गई

पटना। एक समय था जब प्रशांत किशोर (पीके) सिर्फ पर्दे के पीछे बैठकर चुनावी रणनीति बनाते थे। मोदी की 2014 जीत हो या नीतीश कुमार की 2015 की महागठबंधन वाली शानदार वापसी—पीके का नाम हर बड़ी जीत के पीछे जुड़ा रहता था। नीतीश के करीबी रणनीतिकार और कभी जदयू में नंबर-2 जैसे प्रभाव वाले पीके आज खुद विधायक बन गए हैं। बांकीपुर उपचुनाव में उनकी जीत सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की सबसे रोचक कहानियों में से एक बन गई है।

3 अगस्त 2026 को घोषित नतीजों में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बीजेपी के नीरज कुमार को करीब 19 हजार मतों से हराया। उन्होंने 64 हजार से अधिक वोट हासिल किए, जबकि बीजेपी उम्मीदवार को करीब 45 हजार वोट मिले। आरजेडी की रेखा कुमारी तीसरे स्थान पर रहीं। यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि बांकीपुर लंबे समय से बीजेपी का गढ़ रहा है। यहां नितिन नवीन और उससे पहले उनके पिता कई बार जीत चुके थे। नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर पीके ने पहली बार खुद चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।

रणनीतिकार से नेता बनने का सफर

पीके की कहानी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी ही लगती है। एक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से चुनावी सलाहकार, फिर आई-पैक के जरिए कई मुख्यमंत्रियों को जिताने वाला मास्टरमाइंड, और फिर खुद पार्टी बनाकर मैदान में उतरना। 2015 में उन्होंने नीतीश कुमार की महागठबंधन सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। उस समय उन्हें नीतीश के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकारों में गिना जाता था। बाद में रास्ते अलग हो गए। पीके ने जन सुराज पार्टी बनाई और बिहार की सियासत में बदलाव का दावा किया।

2025 के विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई। पार्टी को करीब 3.4 प्रतिशत वोट मिले। कई जगहों पर उनके वोट जीत के अंतर से ज्यादा थे, जिससे वे ‘वोट कटवा’ के आरोपों का शिकार भी हुए। हार के बाद पीके ने खुद जिम्मेदारी ली और कहा था कि जनता का भरोसा नहीं जीत पाए। कई लोगों ने उनकी राजनीतिक मौत की भविष्यवाणी भी कर दी थी।

लेकिन पीके रुके नहीं। उन्होंने बिहार पर फोकस जारी रखा, यात्राएं कीं, लोगों से जुड़े और बांकीपुर जैसे बीजेपी के मजबूत किले को चुनौती दी। नतीजा सामने है—जन सुराज की पहली चुनावी जीत और पीके का विधायक बनना।

जीत का संदेश और आगे की राह

जीत के बाद पीके ने कहा कि बांकीपुर की जनता ने सिर्फ एक विधायक नहीं चुना, बल्कि बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को संदेश दिया है। उन्होंने सम्राट चौधरी सरकार पर निशाना साधते हुए बिहार के युवाओं के पलायन और रोजगार के मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि बिहार को सिर्फ वोट बैंक की तरह न देखा जाए।

यह जीत जन सुराज के लिए नई शुरुआत है। एक विधायक होने के बावजूद पीके विधानसभा में अपनी आवाज को मजबूत कर सकते हैं। नीतीश कुमार अब राज्यसभा में हैं और बिहार की सत्ता सम्राट चौधरी के हाथ में है। ऐसे में पीके की मौजूदगी विपक्षी राजनीति को नया रंग दे सकती है।

रणनीतिकार से नेता, नीतीश के करीबी से उनके आलोचक, हार से जीत तक—प्रशांत किशोर की राजनीतिक यात्रा वाकई कम फिल्मी नहीं। अब देखना यह है कि विधायक पीके बिहार की सियासत में कितना बड़ा किरदार निभाते हैं। बांकीपुर की इस जीत ने साबित कर दिया है कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं।

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