राज्यसभा में मनुस्मृति का जिक्र, पेपर लीक बिल की बहस में फूट पड़ा बवाल; आखिर बार-बार विवाद क्यों?
राज्यसभा में मनुस्मृति का जिक्र, पेपर लीक बिल की बहस में फूट पड़ा बवाल; आखिर बार-बार विवाद क्यों?
राज्यसभा में गुरुवार को एंटी-पेपर लीक बिल (सार्वजनिक परीक्षा अनधिकृत साधन निवारण संशोधन विधेयक 2026) पर चर्चा चल रही थी। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे शिक्षा व्यवस्था और आरएसएस के प्रभाव पर बोलते-बोलते अचानक एक प्राचीन ग्रंथ की ओर मुड़ गए। उन्होंने कहा कि सिलेबस में ऐसी सोच आ रही है जो मनुस्मृति जैसी किताबों से जुड़ी है—शूद्र के वेद सुनने पर कानों में शीशा-जस्ता भर देना, उच्चारण पर जीभ काटना, याद रखने पर शरीर काट देना।
सदन में तुरंत हंगामा हो गया। सत्ता पक्ष के सांसद उठ खड़े हुए। सदन के नेता जेपी नड्डा ने कहा कि ये बातें तथ्यों से परे हैं, मूल पाठ प्रमाणित करो। सुधांशु त्रिवेदी ने भी जवाब दिया। सभापति सीपी राधाकृष्णन ने अंत में मनुस्मृति से जुड़े अंशों को कार्यवाही से हटाने का आदेश दे दिया। करीब 20 मिनट तक सदन में शोरगुल रहा।
लेकिन सवाल सिर्फ संसद की इस एक घटना का नहीं है। मनुस्मृति—जो करीब ढाई हजार साल पुराना धर्मशास्त्र माना जाता है—आधुनिक भारत में बार-बार हमलों का शिकार क्यों होता है?
विवादित श्लोक असल में कहाँ का है?
खड़गे ने जो सजाएं गिनाईं, वे मूल मनुस्मृति में नहीं मिलतीं। शोधकर्ता और संस्कृत विद्वान बताते हैं कि ये प्रावधान गौतम धर्मसूत्र (अध्याय 12, श्लोक 4-6) में हैं:
“अथ हास्य वेदमुपशृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणम्। उद्घारणे जिह्वाच्छेदः। धारणे शरीरभेदः।”
अर्थात—यदि शूद्र जानबूझकर वेद सुनता है तो रांगा या लाख पिघलाकर कान भर दो; उच्चारण करे तो जीभ काट दो; याद रखे तो शरीर के टुकड़े कर दो।
मनुस्मृति में शूद्रों को वेद सिखाने या उनके सामने पाठ करने पर प्रतिबंध जरूर है (जैसे 4.80 या 8.272 में कुछ कठोर दंड के उल्लेख), लेकिन इतनी क्रूर शारीरिक सजा का सीधा प्रावधान नहीं। 19वीं सदी के अनुवादक जूलियस जॉली ने कुछ टीकाओं (व्याख्याओं) के अंशों को मूल पाठ में मिला दिया था। पैट्रिक ओलिवेल जैसे आधुनिक विद्वानों के क्रिटिकल एडिशन में यह साफ लिखा है कि प्राचीन पांडुलिपियों में ये श्लोक मनुस्मृति का हिस्सा नहीं थे।
खड़गे ने बाद में स्पष्ट किया कि गौतम ऋषि का उल्लेख है, लेकिन सदन में “मनुस्मृति” शब्द इतना शक्तिशाली साबित हुआ कि बहस वहीं अटक गई।
क्यों बन जाता है ये ग्रंथ राजनीतिक हथियार?
मनुस्मृति को “हिंदू कानून का मूल स्रोत” माना जाता है। इसमें वर्ण व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, विवाह, संपत्ति, दंड विधान—सब कुछ संहिताबद्ध है। उस समय का समाज जिस तरह चल रहा था, उसे नियमबद्ध करने की कोशिश थी। लेकिन इसमें जाति और लिंग आधारित कई असमानताएं हैं।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1927 में महाड में मनुस्मृति जलाई थी। उनके लिए यह जाति उत्पीड़न का प्रतीक बन गया। आज भी दलित-बहुजन आंदोलनों में इसे “मनुवादी सोच” का प्रतीक बताकर विरोध किया जाता है। दूसरी ओर, कई हिंदू संगठन कहते हैं कि इसे संदर्भ से काटकर पढ़ा जाता है; स्मृतियां काल-सापेक्ष थीं, वेद शाश्वत हैं, और आज संविधान सर्वोपरि है।
राजनीति में यह आसानी से इस्तेमाल हो जाता है। विपक्ष जब शिक्षा नीति, आरक्षण या आरएसएस के प्रभाव पर हमला करना चाहता है, तो “मनुस्मृति” शब्द तुरंत भावुक प्रतिक्रिया पैदा करता है। सत्ता पक्ष इसे “समाज में अशांति फैलाने वाली बात” करार देता है। नतीजा—वास्तविक मुद्दा (पेपर लीक, परीक्षा सुधार) पीछे छूट जाता है।
प्राचीन ग्रंथ, आधुनिक सवाल
स्मृतियां वेदों के बाद की रचनाएं हैं—वेद सुनकर, समझकर और अनुभव करके जो नियम बने, वे स्मृति कहलाए। मनुस्मृति इनमें सबसे प्रभावशाली रही। लेकिन कोई भी प्राचीन ग्रंथ आज के मानकों से नहीं जज किया जा सकता। उस दौर में दुनिया भर में गुलामी, जाति-समानता और महिलाओं के अधिकार अलग थे।
आज भारत का संविधान समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे पर टिका है। शिक्षा हर किसी का अधिकार है। फिर भी जब कोई नेता या कार्यकर्ता “मनुस्मृति” का नाम लेता है, तो इतिहास, अपराधबोध और वर्तमान राजनीति एक साथ उठ खड़ी होती है।
राज्यसभा की बहस ने एक बार फिर याद दिला दिया—प्राचीन ग्रंथों को या तो पूरी तरह नकार दिया जाता है, या पूरी तरह महिमामंडित। बीच का रास्ता—ऐतिहासिक संदर्भ में समझना और वर्तमान मूल्यों से तुलना करना—अक्सर गायब रहता है।
पेपर लीक बिल पर चर्चा जारी रहेगी। लेकिन मनुस्मृति का विवाद, लगता है, अगली कई बहसों में भी लौट आएगा।
(यह रिपोर्ट संसदीय कार्यवाही, विद्वानों के शोध और उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित है।)
