फिल्म समीक्षा: ‘भाई तेरा स्टार है’ — थकाऊ लेखन और ढीले निर्देशन के बोझ तले दबी राघव जुयाल की सोलो लीड फिल्म
फिल्म समीक्षा: ‘भाई तेरा स्टार है’ — थकाऊ लेखन और ढीले निर्देशन के बोझ तले दबी राघव जुयाल की सोलो लीड फिल्म
फिल्म: भाई तेरा स्टार है
कलाकार: राघव जुयाल, पार्वती ओमानाकुट्टन, निहारिका एनएम, संजय कपूर, विवान भटेना, चंदन रॉय सान्याल, नीकी वालिया और बरखा सिंह
निर्देशक: विवेक बी. अग्रवाल (सह-लेखक: सुदीप्तो सरकार)
अवधि: 1 घंटा 45 मिनट
मूवी रिव्यू का मुख्य सारांश:
सिनेमा के इतिहास में एक ही रात के घटनाक्रम पर आधारित फिल्में हमेशा से दर्शकों और निर्देशकों के लिए जबरदस्त आकर्षण का केंद्र रही हैं। सीमित दायरा, टिक-टिक करती घड़ी और असीम संभावनाएं—ये पहलू किसी साधारण सी कहानी में भी स्लैपस्टिक कॉमेडी का बेहतरीन तड़का लगा सकते हैं। ‘भाई तेरा स्टार है’ इसी जॉनर को भुनाने का प्रयास करती है और डांसर से अभिनेता बने राघव जुयाल की बतौर सोलो लीड पहली बड़ी फिल्म है।
फिल्म का मूल विचार 90 के दशक की प्रियदर्शन और गोविंदा स्टाइल की अनिरुद्ध, अतरंगी और भगदड़ वाली ‘कॉमेडी-ऑफ-एरर्स’ (Comedy of Errors) की याद दिलाता है। कागज पर प्लॉट में स्लैपस्टिक कॉमेडी के सारे मसाले मौजूद थे, लेकिन पर्दे पर उतरते ही यह फिल्म अपने ही कमजोर लेखन के बोझ तले दब जाती है।
क्या है कहानी और प्लॉट?
कहानी लंदन की कड़ाके की ठंड में शुरू होती है, जहां अजय सिंह (राघव जुयाल) खुद को बॉलीवुड का अगला सुपरस्टार मानता है, हालांकि उसमें अभिनय के नाम पर केवल ओवरकॉन्फिडेंस और बचकानी हरकतें हैं। झटपट अमीर बनने के चक्कर में अजय क्रिकेट सट्टेबाजी के जाल में फंस जाता है और लंदन के क्लब मालिक फैटी (संजय कपूर) से 10,000 पौंड हार बैठता है।
फैटी उसे अल्टीमेटम देता है कि सूरज उगने से पहले पैसे न मिले तो अंजाम बुरा होगा। जान और इज्जत बचाने के लिए अजय के पास केवल एक रात का वक्त है। यहां से शुरू होती है पूरे लंदन शहर में मची एक पागलों जैसी भाग-दौड़।
पार्वती ओमानाकुट्टन (नताशा): अजय की बहन, जो अपने नए करोड़पति बॉयफ्रेंड के साथ शाम बिताने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसका पजेसिव एक्स-बॉयफ्रेंड सिड (विवान भटेना) रायता फैला रहा है।
निहारिका एनएम (रोशनी): अजय की प्रेमिका और सिड की बहन, जो अजय की मुसीबत सुलझाने के चक्कर में अफ़रातफरी का हिस्सा बनती है।
आधी-अधूरी जानकारी, उधारी और झूठ के जाल में सभी किरदार एक ही छत के नीचे इकट्ठा होते हैं और गलतफहमियों का बवंडर खड़ा हो जाता है।
निर्देशन, तकनीकी पक्ष और संगीत:
निर्देशन व संपादन: निर्देशक विवेक बी. अग्रवाल का नियंत्रण पूरी तरह ढीला नजर आता है। 1 घंटे 45 मिनट की फिल्म होने के बावजूद संपादन (Editing) बेहद सुस्त है और यह एक थकाऊ सपने जैसी महसूस होती है।
सिनेमैटोग्राफी: लंदन की रातों, रोशन सड़कों और विजुअल टोन को खूबसूरती से दर्शाया गया है।
संगीत: अमित त्रिवेदी का संगीत ठीक-ठाक है, लेकिन गाने कहानी की गति में रुकावट बनते हैं। एंड क्रेडिट्स के बाद दो गाने जबरन ठूंसे गए हैं। बैकग्राउंड स्कोर में इंस्टाग्राम रील्स के साउंड इफेक्ट्स का बेहिसाब इस्तेमाल झुंझलाहट पैदा करता है।
अभिनय प्रदर्शन:
राघव जुयाल: राघव ने अपनी पूरी एनर्जी झोंक दी है। उनकी कॉमिक टाइमिंग और फुर्ती बेहतरीन है, लेकिन कमजोर पटकथा के कारण कई जगह उनकी एक्टिंग ओवरएक्टिंग लगने लगती है।
पार्वती ओमानाकुट्टन: पूरी फिल्म में सबसे संतुलित और परिपक्व अभिनय पार्वती का है, जो राहत की सांस देता है।
संजय कपूर व चंदन रॉय सान्याल: संजय कपूर सिर्फ चिल्लाते नजर आते हैं, वहीं चंदन रॉय सान्याल जैसे मंझे हुए अभिनेता को केवल भाग-दौड़ और चीखने के लिए रखकर पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया।
निहारिका एनएम व बरखा सिंह: निहारिका की डायलॉग डिलीवरी औसत है और बरखा सिंह के किरदार को नजरअंदाज कर दिया गया है।
निष्कर्ष और वर्डिक्ट (Verdict):
’भाई तेरा स्टार है’ उन फिल्मों की सूची में शामिल होती है जिनके पास एक बेहतरीन प्लॉट और ऊर्जावान मुख्य अभिनेता तो था, लेकिन सही लेखन के अभाव में पूरी तरह पटरी से उतर गई। फिल्म में हास्य पैदा करने के लिए संवादों के बजाय आवाज़ के वॉल्यूम (चीखने-चिल्लाने) को बढ़ा दिया गया है।
अंतिम फैसला: यदि आप राघव जुयाल के डाई-हार्ड फैन हैं और बिना दिमाग लगाए केवल शोर-शराबे वाली सिचुएशनल कॉमेडी देखना पसंद करते हैं तो शायद इसे बर्दाश्त कर पाएं, वरना सिनेमाघर जाने के बजाय इस रात को टाल देना ही बेहतर फैसला होगा।
