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सूर्य मिशन ‘आदित्य-L1’ की बड़ी कामयाबी: पहली बार दर्ज की सूर्य पर ‘आयरन फ्लोरेसेंस’ की अनोखी घटना

सूर्य मिशन ‘आदित्य-L1’ की बड़ी कामयाबी: पहली बार दर्ज की सूर्य पर ‘आयरन फ्लोरेसेंस’ की अनोखी घटन

​बेंगलुरु: भारत के पहले सूर्य मिशन ‘आदित्य-L1’ (Aditya-L1) ने अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में एक और बड़ी सफलता हासिल की है. लैग्रेंजियन पॉइंट 1 (L1) पर तैनात यह स्पेसक्राफ्ट हमारे सबसे करीबी तारे (सूर्य) के अनसुलझे रहस्यों को लगातार उजागर कर रहा है.

​भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के अनुसार, साल 2024 के दौरान सूर्य अपनी चरम गतिविधि (सोलर मैक्सिमम) पर था, जिससे कई शक्तिशाली सौर तूफान (सोलर फ्लेयर) पैदा हुए. इसी दौरान आदित्य-L1 ने सूर्य की सतह पर होने वाली एक अत्यंत दुर्लभ और अनोखी घटना ‘आयरन फ्लोरेसेंस’ (Iron Fluorescence) को दर्ज किया है.

​क्या है ‘आयरन फ्लोरेसेंस’ की घटना?

​ISRO के वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब सूर्य पर कोई विशाल सौर तूफान (सोलर फ्लेयर) आता है, तो वह सूर्य के बाहरी और बेहद गर्म वायुमंडल यानी ‘कोरोना’ के तापमान को करोड़ों डिग्री तक बढ़ा देता है. इसके परिणामस्वरूप वहां से अत्यधिक ऊर्जा वाली X-किरणों (High-Energy X-rays) का एक महाविस्फोट होता है.

​सूरज की सतह से टकराव: हालांकि इनमें से अधिकांश X-किरणें अंतरिक्ष में फैल जाती हैं, लेकिन कुछ किरणें नीचे की ओर जाकर सूर्य की तुलनात्मक रूप से ठंडी और घनी सतह, जिसे ‘फोटोस्फीयर’ (Photosphere) कहा जाता है, से टकराती हैं.

​चमक पैदा होना: फोटोस्फीयर में बड़ी मात्रा में मौजूद न्यूट्रल आयरन (लोहे) के परमाणु इन शक्तिशाली कोरोनल X-किरणों की ऊर्जा को सोख लेते हैं. ऊर्जा सोखने के बाद ये आयरन एटम्स उत्तेजित होकर 6.40 keV की निश्चित ऊर्जा पर अपनी एक खास X-रे चमक छोड़ते हैं. इसी पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया को ‘X-रे फ्लोरेसेंस’ या ‘आयरन फ्लोरेसेंस’ कहा जाता है.

​स्वदेशी पेलोड ‘SoLEXS’ ने की खोज

​आदित्य-L1 पर लगा सोलर लो एनर्जी X-रे स्पेक्ट्रोमीटर (SoLEXS) इस तरह की हल्की से हल्की X-रे चमक और फोटोस्फेरिक आयरन फ्लोरेसेंस का पता लगाने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किया गया है. इस अत्याधुनिक उपकरण को ISRO के ‘यू आर राव सैटेलाइट सेंटर’ (URSC) में पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित किया गया है.

​डेटा के अनुसार, कोरोना में ऊंचाई पर मौजूद सोलर फ्लेयर से निकलने वाली X-किरणें जब सूर्य की सतह पर गिरती हैं, तो वहां मौजूद लोहे के परमाणु इन्हें सोखकर नीले तीर जैसी चमक (फ्लोरेसेंस) उत्सर्जित करते हैं, जिसे SoLEXS ने कैप्चर किया है.

​’सेंटर-टू-लिम्ब’ बदलाव से खुलेगा रहस्य

​प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका ‘सोलर फिजिक्स’ में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन के अनुसार, आयरन फ्लोरेसेंस की यह चमक इस बात पर निर्भर करती है कि सौर तूफान सूर्य की सतह पर किस जगह उठा है.

​सूर्य की डिस्क के केंद्र (Center) के पास उठने वाले फ्लेयर्स बहुत मजबूत फ्लोरेसेंस सिग्नल दिखाते हैं.

​इसके विपरीत, सूर्य के किनारे (Limb) के पास होने वाले सौर तूफानों से यह सिग्नल काफी कमजोर या दबा हुआ मिलता है.

​इस ‘सेंटर-टू-लिम्ब’ बदलाव के गणितीय और थ्योरेटिकल मॉडल के जरिए अब रिसर्चर ‘आयरन फ्लोरेसेंस’ को एक बेहतरीन डायग्नोस्टिक टूल की तरह इस्तेमाल कर सकेंगे. इससे सौर वायुमंडल में कोरोनल एक्स-रे के मुख्य सोर्स की सटीक ऊंचाई और उसकी बनावट को समझा जा सकेगा.

​क्यों खास है आदित्य-L1 की यह खोज?

​सूर्य के वातावरण को समझने में मदद: इस खोज से वैज्ञानिक अब यह आसानी से जान सकेंगे कि सौर फ्लेयर के दौरान सूर्य के बाहरी वातावरण (कोरोना) में एक्स-रे किस तरह पैदा होती हैं और कैसे फैलती हैं.

​सौर तूफानों की सटीक स्टडी: इसके जरिए सोलर फ्लोरेसेंस की ऊंचाई, उसकी आंतरिक संरचना और ज्योमेट्री का पहले से कहीं अधिक सटीक अध्ययन संभव हो सकेगा.

​अंतरिक्ष के मौसम (Space Weather) की सटीक भविष्यवाणी: सौर तूफान पृथ्वी पर मौजूद सैटेलाइट्स, जीपीएस (GPS), मोबाइल कम्युनिकेशन और पावर ग्रिड को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं. आदित्य-L1 की यह स्टडी भविष्य में स्पेस वेदर मॉनिटरिंग और एडवांस अलर्ट सिस्टम को बेहतर बनाने में गेम-चेंजर साबित होगी.

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