“करनी और कथनी पर लगाएं लगाम”: यूरेशिया रिव्यू की रिपोर्ट में पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर को नसीहत
“करनी और कथनी पर लगाएं लगाम”: यूरेशिया रिव्यू की रिपोर्ट में पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर को नसीहत
पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को लेकर एक बार फिर वैश्विक पटल पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। ‘यूरेशिया रिव्यू’ में प्रकाशित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को अपनी करनी और कथनी पर लगाम लगाने की सख्त सलाह दी गई है। इस रिपोर्ट में आंकड़ों के हवाले से मुनीर को नसीहत दी गई है कि वे लगातार आक्रामक बयानबाजी करने के बजाय अपनी नीतियों और फैसलों का पाकिस्तान पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभावों का गंभीरता से आकलन करें।
27वें संवैधानिक संशोधन से मुनीर बने ‘सुपर कमांडर’
इस खोजी लेख में सेवानिवृत्त भारतीय सेना अधिकारी निलेश कुंवर ने दावा किया है कि आसिम मुनीर ने साल 2024 के आम चुनावों को पूरी तरह प्रभावित कर अपना असली रंग दिखाया था, जिसके बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक और सैन्य स्थिति को और मजबूत कर लिया। लेख के अनुसार:
”पाकिस्तान के 27वें संवैधानिक संशोधन के बाद फील्ड मार्शल आसिम मुनीर, चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) के रूप में देश की सशस्त्र सेनाओं के वास्तविक सर्वोच्च कमांडर बन गए हैं। इस संशोधन के तहत सीडीएफ पद को व्यापक अधिकार दिए गए हैं और उन्हें आजीवन कानूनी कार्रवाई से संरक्षण (इम्युनिटी) भी प्राप्त है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह बेहद असामान्य बात है, जिससे जवाबदेही के बिना अत्यधिक शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित हो गई हैं।”
अफगानिस्तान नीति और हवाई हमलों पर उठे सवाल
रिपोर्ट में अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के लगातार बिगड़ते संबंधों और सीमा पार सैन्य कार्रवाई पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। लेख में कहा गया है कि सीमा पार आतंकी ठिकानों को निशाना बनाने की मुनीर की रणनीति से पाकिस्तान को कोई अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, बल्कि इससे क्षेत्रीय तनाव और अधिक बढ़ गया है।
निलेश कुंवर ने तर्क दिया कि यदि पाकिस्तान का यह दावा सही भी मान लिया जाए कि अफगानिस्तान में ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान’ (TTP) के लड़ाकों को शरण मिल रही है, तब भी अफगान क्षेत्र में कथित ठिकानों पर हवाई हमलों (एयरस्ट्राइक) से सैन्य स्तर पर बहुत सीमित परिणाम ही हासिल हो सकते थे। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी होने के नाते फील्ड मार्शल मुनीर को इस बात का भली-भांति आभास होना चाहिए था कि ऐसी कार्रवाइयों से टीटीपी के खिलाफ कोई निर्णायक सफलता मिलना नामुमकिन है।
खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में बढ़ा आंतरिक संकट
पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ पीस स्टडीज (PPIS) के चौंकाने वाले आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोली गई है:
खैबर पख्तूनख्वा: साल 2025 में पाकिस्तान में हुई कुल आतंकवादी घटनाओं में से 71 प्रतिशत अकेले खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में दर्ज की गईं।
डूरंड रेखा पर खतरा: लेखक का मानना है कि पाकिस्तान के आक्रामक रवैये के कारण अफगान सरकार और टीटीपी के बीच नजदीकियां और बढ़ सकती हैं, जिससे डूरंड रेखा के आसपास सुरक्षा चुनौतियां और अधिक जटिल हो जाएंगी।
बलूचिस्तान और पीओजेके: बलूचिस्तान की गंभीर स्थिति का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि दमनकारी सुरक्षा नीतियों के कारण स्थानीय नागरिकों में असंतोष चरम पर है। इसके साथ ही, पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (POJK) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाई जा रही पाबंदियों को लेकर भी गहरी चिंता जताई गई है।
”जनता को लंबे समय तक भ्रमित नहीं रखा जा सकता”
लेखक ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा है कि अपनी हर विफलता, आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों के लिए बाहरी शक्तियों (विदेशी ताकतों) को जिम्मेदार ठहराने की पुरानी आदत को छोड़कर पाकिस्तानी नेतृत्व को अपनी नीतियों की प्रभावशीलता पर आत्ममंथन करना चाहिए।
मुनीर को कड़ा संदेश देते हुए लेखक ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के एक प्रसिद्ध कथन का उल्लेख किया कि—”किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को लंबे समय तक भ्रमित नहीं रखा जा सकता।” लेखक के अनुसार, शायद फील्ड मार्शल मुनीर को इस विचार पर गहराई से मनन करने की सख्त आवश्यकता है।
