उत्तराखंड

रोजगार और नियमावली की मांग को लेकर लैब टेक्नोलॉजिस्ट का सचिवालय कूच, जबरन हटाए जाने के बाद अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे

रोजगार और नियमावली की मांग को लेकर लैब टेक्नोलॉजिस्ट का सचिवालय कूच, जबरन हटाए जाने के बाद अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे

​देहरादून। उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ माने जाने वाले बेरोजगार लैब तकनीशियनों का गुस्सा फूट पड़ा है। अपनी विभिन्न न्यायसंगत मांगों को लेकर मंगलवार को मेडिकल लैब टेक्नोलॉजिस्ट संघ से जुड़े सैकड़ों टेक्नीशियनों ने सचिवालय कूच किया। हालांकि, पुलिस प्रशासन ने सचिवालय से ठीक पहले भारी बैरिकेडिंग लगाकर प्रदर्शनकारियों को रोक दिया, जिसके बाद आक्रोशित बेरोजगार सड़क पर ही धरने पर बैठ गए और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

​सड़क पर हंगामा और जाम बढ़ता देख पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को जबरन वाहनों में भरा और उन्हें एकता विहार धरना स्थल ले जाकर छोड़ दिया। इस कार्रवाई से नाराज होकर सभी लैब टेक्नीशियन अब अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं।

​पूर्व सीएम खंडूड़ी को दी श्रद्धांजलि; 26 साल बाद भी नियमावली न होने पर रोष

​आंदोलन की शुरुआत में संगठन की ओर से उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया गया। सभी प्रदर्शनकारियों ने 2 मिनट का मौन रखकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

​इसके बाद संघ के पदाधिकारियों ने राज्य सरकार की नीतियों पर कड़ा प्रहार किया:

​रोजगार का अभाव: संघ के नेताओं ने कहा कि राज्य गठन से पहले से संचालित हो रहे ‘बीएससी एमएलटी’ (B.Sc. MLT) पाठ्यक्रम से हर साल सैकड़ों छात्र-छात्राएं डिग्री लेकर पास हो रहे हैं।

​26 साल का इंतजार: बेहद अफसोस की बात है कि राज्य गठन के 26 साल बाद भी लैब टेक्निशियनों के लिए आज तक कोई स्पष्ट सेवा नियमावली और स्थाई रोजगार की ठोस व्यवस्था नहीं की गई है। युवाओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है।

​”सरकारी लैबों का निजीकरण और पीपीपी मोड बर्दाश्त नहीं” — मयंक राणा

​संघ के महासचिव मयंक राणा ने स्वास्थ्य विभाग और सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा:

​”एक तरफ प्रदेश में हजारों पंजीकृत और प्रशिक्षित लैब टेक्नीशियन बेरोजगार घूम रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार उन्हें सेवाओं से वंचित रख रही है। सरकारी अस्पतालों की लैबों को जानबूझकर पीपीपी (PPP) मोड पर निजी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। सरकार के इस कदम से न सिर्फ स्थाई रोजगार के अवसर हमेशा के लिए खत्म हो रहे हैं, बल्कि पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं।”

​पहाड़ी जिलों में जनता पर पड़ रहा है आर्थिक बोझ

​आंदोलनकारियों ने दर्द बयां करते हुए कहा कि उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में लैब टेक्निशियनों की भारी किल्लत है। इसके कारण वहां के गरीब ग्रामीणों को खून, पेशाब जैसी छोटी-छोटी बुनियादी जांचें कराने के लिए भी मीलों दूर जिला मुख्यालयों या निजी सेंटरों में जाना पड़ता है। इससे उन्हें मानसिक परेशानी तो होती ही है, साथ ही उनकी जेब पर भारी अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी पड़ता है।

​मेडिकल लैब टेक्नॉजिस्ट संघ की मुख्य मांगें:

​बेरोजगार संगठन ने स्पष्ट किया है कि वे तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक सरकार उनकी निम्नलिखित मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लेती:

​पदों का सृजन: प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में IPHS (इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड) मानकों के अनुरूप लैब टेक्निशियनों के नए पदों को तुरंत सृजित किया जाए।

​वर्षवार (Seniority) भर्ती: विभाग में जितने भी पद वर्तमान में रिक्त चल रहे हैं, उन्हें बिना किसी देरी के ‘वर्षवार मेरिट’ के आधार पर पूरी तरह पारदर्शी तरीके से भरा जाए।

​आयु सीमा में छूट: लंबे समय से सरकारी भर्ती न आने के कारण जो अभ्यर्थी नौकरी की पात्रता की उम्र पार (Overage) कर चुके हैं, उन्हें इस आगामी भर्ती में आयु सीमा में विशेष छूट प्रदान की जाए।

​निजीकरण पर रोक: सरकारी पैथोलॉजी लैबों को पीपीपी मोड या निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया पर तुरंत प्रभावी रोक लगाई जाए।

​संघ ने दोटूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि धामी सरकार ने जल्द ही उनकी मांगों का संज्ञान लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो वे अपने इस अनिश्चितकालीन धरने को एक उग्र और राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदलने के लिए मजबूर होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

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