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कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026: लिपुलेख दर्रे को लेकर भारत और नेपाल में कूटनीतिक तकरार

कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026: लिपुलेख दर्रे को लेकर भारत और नेपाल में कूटनीतिक तकरार

​नई दिल्ली/काठमांडू: कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली को लेकर भारत और नेपाल के बीच एक बार फिर सीमा विवाद गहरा गया है। नेपाल की बालेन्द्र शाह सरकार ने उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से होकर होने वाली इस यात्रा पर कड़ी आपत्ति जताई है।

​1. विवाद की मुख्य वजह: भारत की घोषणा

​भारत के विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल को घोषणा की थी कि जून से अगस्त 2026 के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू की जाएगी। योजना के अनुसार:

​कुल 10 बैच भेजे जाएंगे।

​प्रत्येक बैच में 50 तीर्थयात्री होंगे।

​यह यात्रा उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे के रास्ते तिब्बत (चीन) में प्रवेश करेगी।

​2. नेपाल का रुख: “यह हमारी जमीन है”

​भारत की इस घोषणा के तुरंत बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई। नेपाल का तर्क है कि:

​सुगौली संधि (1816): इस संधि के अनुसार लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी का इलाका महाकाली नदी के पूर्व में है, जो नेपाल का अभिन्न हिस्सा है।

​त्रिपक्षीय चिंता: नेपाल ने भारत और चीन दोनों को अपनी चिंताओं से अवगत कराया है और मांग की है कि इस क्षेत्र में सड़क निर्माण या तीर्थयात्रा जैसी गतिविधियां रोकी जाएं।

​3. भारत का कड़ा जवाब: “दावे बनावटी और तथ्यहीन”

​नेपाल के दावों पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा:

​ऐतिहासिक मार्ग: लिपुलेख दर्रा 1954 से ही मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है। यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है।

​सबूतों का अभाव: नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित नहीं हैं। एकतरफा तरीके से क्षेत्रीय दावों को बढ़ाना स्वीकार्य नहीं है।

​संवाद की पेशकश: भारत ने स्पष्ट किया है कि वह नेपाल के साथ सीमा मुद्दों पर ‘कंस्ट्रक्टिव’ (रचनात्मक) बातचीत और डिप्लोमेसी के लिए हमेशा तैयार है।

​4. लिपुलेख का सामरिक महत्व

​लिपुलेख दर्रा हिमालय में भारत, नेपाल और चीन के बीच एक ‘ट्राई-जंक्शन’ (त्रिकोणीय बिंदु) पर स्थित है।

​नियंत्रण: 1962 के युद्ध के बाद से यह क्षेत्र भारतीय सुरक्षा बलों के नियंत्रण में है।

​पिछला विवाद: 2015 और 2025 में भी जब भारत और चीन ने इस रास्ते व्यापार बढ़ाने पर सहमति जताई थी, तब नेपाल ने कड़ा विरोध किया था।

​निष्कर्ष: जहाँ भारत इस मार्ग को अपनी दशकों पुरानी परंपरा और संप्रभुता का हिस्सा मानता है, वहीं नेपाल की वर्तमान सरकार इसे अपनी क्षेत्रीय अखंडता से जोड़कर देख रही है। फिलहाल, दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनातनी जारी है, लेकिन भारत यात्रा की तैयारियों पर अडिग है।

 

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