पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: पहले चरण में 92% रिकॉर्ड मतदान, सत्ता परिवर्तन की आहट या ममता पर अटूट भरोसा?
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: पहले चरण में 92% रिकॉर्ड मतदान, सत्ता परिवर्तन की आहट या ममता पर अटूट भरोसा?
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण के मतदान ने पूरे देश को चौंका दिया है। राज्य के 16 जिलों की 152 सीटों पर हुए मतदान में 91.78% (करीब 92%) वोटिंग दर्ज की गई है, जो न केवल बंगाल बल्कि भारतीय चुनावी इतिहास के सबसे ऊंचे आंकड़ों में से एक है। 2021 में इन्हीं सीटों पर 82.64% मतदान हुआ था, यानी इस बार करीब 9% का भारी उछाल आया है।
इस बंपर वोटिंग ने राजनीतिक पंडितों के बीच बहस छेड़ दी है—क्या यह सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) है या फिर ममता सरकार की योजनाओं के प्रति जनता का समर्थन?
SIR (विशेष मतदाता पुनरीक्षण) का असर या जनता का उत्साह?
इतने बड़े मतदान प्रतिशत के पीछे एक तकनीकी कारण Special Intensive Revision (SIR) को माना जा रहा है।
नामों की कटौती: चुनाव से पहले वोटर लिस्ट से लगभग 91 लाख (12%) ऐसे नाम हटाए गए जो मृतक थे या पलायन कर चुके थे।
गणित का खेल: जब आधार (Total Voters) छोटा हो जाता है और सक्रिय मतदाता बड़ी संख्या में निकलते हैं, तो प्रतिशत अपने आप बढ़ जाता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित ट्रिब्यूनलों ने 27 लाख हटाए गए नामों में से केवल 139 के वोट बहाल किए हैं।
क्या ज्यादा मतदान हमेशा सरकार की विदाई है?
ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि ज्यादा वोटिंग का मतलब हमेशा हार नहीं होता:
1984 का उदाहरण: इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 7% ज्यादा वोटिंग हुई, लेकिन सहानुभूति लहर के चलते कांग्रेस ने रिकॉर्ड 415 सीटें जीतीं।
बंगाल का इतिहास: 1977 से 1982 के बीच बंगाल में मतदान 20% बढ़ा था, फिर भी लेफ्ट की सरकार बनी रही।
विपरीत परिणाम: हालांकि, 1977 और 2014 के चुनावों में भारी मतदान ने केंद्र की सत्ताओं को उखाड़ फेंका था।
प्रमुख मुद्दे और ‘रेवड़ी राजनीति’ का घमासान
इस बार का चुनाव केवल विकास पर नहीं, बल्कि सीधे आर्थिक लाभ (Welfare Schemes) पर टिका है:
लक्ष्मी भंडार vs बीजेपी का वादा: ममता सरकार महिलाओं को 1500-1700 रुपये दे रही है, जबकि बीजेपी ने सत्ता में आने पर 3000 रुपये देने का दांव खेला है।
बेरोजगारी भत्ता: टीएमसी के 1500 रुपये के मुकाबले बीजेपी ने 3000 रुपये का वादा किया है।
अन्य मुद्दे: भ्रष्टाचार, शिक्षा-स्वास्थ्य की बदहाली, घुसपैठ और ममता सरकार के 15 साल के कामकाज का लेखा-जोखा इस चुनाव के केंद्र में है।
बीजेपी की सेंधमारी और टीएमसी का किला
बीजेपी इस बार ‘हिंदू कार्ड’ और भ्रष्टाचार के मुद्दों के सहारे पहली बार बंगाल का दरवाजा खोलने की कोशिश में है।
चुनौती: बंगाल की 27% मुस्लिम आबादी बीजेपी के लिए सबसे बड़ी बाधा है। जीत के लिए बीजेपी को 65-70% हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की आवश्यकता होगी।
वोट कटवा फैक्टर: हुमायूं कबीर और ओवैसी की पार्टी मुस्लिम वोटों में कितनी सेंध लगाती है, इसका सीधा असर टीएमसी की सीटों पर पड़ेगा।
निष्कर्ष: प्रधानमंत्री मोदी ने जहां 4 मई को ‘झालमुड़ी’ और मिठाई बांटने का वादा किया है, वहीं ममता बनर्जी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं। 92% मतदान ने यह तो साफ कर दिया है कि जनता बदलाव या निरंतरता के लिए बेहद सक्रिय है, लेकिन ‘नतीजों की केमिस्ट्री’ अभी भी भविष्य के गर्भ में है।
