जनगणना 2026: अब लिव-इन कपल्स की भी होगी गिनती; शादीशुदा जोड़ों की श्रेणी में मिल सकती है जगह
जनगणना 2026: अब लिव-इन कपल्स की भी होगी गिनती; शादीशुदा जोड़ों की श्रेणी में मिल सकती है जगह
भारत सरकार आगामी जनगणना में देश के बदलते सामाजिक परिवेश को ध्यान में रखते हुए एक ऐतिहासिक कदम उठाने जा रही है। अब जनगणना के दौरान लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को अलग से चिन्हित किया जाएगा। इस पहल का मुख्य उद्देश्य देश के आधुनिक सामाजिक ढांचे और पारिवारिक व्यवस्था के नए स्वरूप का सटीक सांख्यिकीय आंकलन करना है।
रिश्ते की गहराई और स्थिरता पर होंगे सवाल
जनगणना प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों द्वारा लिव-इन जोड़ों से उनके जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे जा सकते हैं। इनमें मुख्य रूप से शामिल होंगे:
साथ रहने की कुल अवधि।
पारिवारिक संरचना और बच्चों की स्थिति।
उनकी साझा आर्थिक व्यवस्था।
इन आंकड़ों की मदद से सरकार यह समझने का प्रयास करेगी कि शहरी और ग्रामीण भारत में लिव-इन संबंधों की स्वीकार्यता और वास्तविकता क्या है।
क्या इन्हें शादीशुदा माना जाएगा?
1 अप्रैल 2026 से शुरू हो रहे जनगणना के पहले चरण (हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग एनुमरेशन) में कुल 33 सवाल पूछे जाएंगे। लिव-इन कपल्स की स्थिति को लेकर यह स्पष्ट किया गया है कि:
यदि कोई जोड़ा अपने रिश्ते को एक स्थिर और स्थायी बंधन मानता है, तो उन्हें शादीशुदा कपल के रूप में दर्ज किया जा सकता है। यह विशेष रूप से उन जोड़ों के लिए है जो लंबे समय से साथ हैं या भविष्य में विवाह की योजना बना रहे हैं।
कानूनी स्थिति और सांख्यिकीय उद्देश्य
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह बदलाव केवल डेटा संग्रह (Data Collection) के उद्देश्य से किया जा रहा है।
सांख्यिकीय उद्देश्य: इसका लक्ष्य केवल सामाजिक वास्तविकता को कागजों पर उतारना है।
कानूनी अधिकार: जनगणना में ‘शादीशुदा’ दर्ज होने मात्र से जोड़ों को कानूनी रूप से विवाहित होने के अधिकार (जैसे संपत्ति का उत्तराधिकार या अन्य कानूनी लाभ) प्राप्त नहीं होंगे।
उत्तराखंड बना मार्गदर्शक
लिव-इन जोड़ों के पंजीकरण और गणना के मामले में उत्तराखंड देश का पहला राज्य बनने जा रहा है जहाँ यह प्रक्रिया पहले ही लागू की जा रही है। वहां स्वगणना (Self-Enumeration) के दौरान ऐसे जोड़ों को खुद को विवाहित श्रेणी में दर्ज कराने की छूट दी गई है, बशर्ते उनका रिश्ता गंभीर और दीर्घकालिक हो।
इस नई व्यवस्था से उम्मीद जताई जा रही है कि भारत की जनसांख्यिकीय रिपोर्ट पहले से कहीं अधिक पारदर्शी और आधुनिक होगी।
