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डेनमार्क ने 400 साल तक समुद्र में वसूला टैक्स, अब ईरान बना रहा ‘होर्मुज टोल प्लाजा’?

डेनमार्क ने 400 साल तक समुद्र में वसूला टैक्स, अब ईरान बना रहा ‘होर्मुज टोल प्लाजा’?

दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान अब एक नया मॉडल आजमा रहा है — जहाजों से टोल (शुल्क) वसूलना। ईरानी संसद की सुरक्षा समिति ने हाल ही में “स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रबंधन योजना” को मंजूरी दे दी है, जिसमें जहाजों से सुरक्षित गुजरने के बदले टोल वसूलने का प्रावधान शामिल है। कुछ रिपोर्ट्स में इसे “Tehran Toll Booth” कहा जा रहा है।

डेनमार्क का ऐतिहासिक उदाहरण: Sound Dues (Øresund Tolls)

1429 में डेनमार्क के राजा एरिक ऑफ पोमेरानिया ने ओरेसंड (Sound) जलडमरूमध्य पर टोल लगाया। यह डेनमार्क और स्वीडन के बीच का संकीर्ण रास्ता था, जो बाल्टिक सागर को नॉर्थ सी से जोड़ता था।

टोल 1857 तक (लगभग 428 साल) चला।

16वीं-17वीं शताब्दी में यह डेनमार्क की कुल सरकारी आय का दो-तिहाई हिस्सा होता था।

शुरू में प्रति जहाज फीस, बाद में माल की कीमत का 1-2% (कभी 5% तक) टैक्स।

डेनमार्क ने इस आय से नौसेना मजबूत की, महल बनवाए और युद्ध लड़े।

1857 के कोपेनहेगन कन्वेंशन में बड़े maritime देशों ने डेनमार्क को एकमुश्त मुआवजा (indemnity) देकर टोल हमेशा के लिए खत्म करवाया।

यह इतिहास दिखाता है कि संकीर्ण समुद्री रास्ते पर नियंत्रण कितना फायदेमंद हो सकता है।

ईरान का नया कदम: होर्मुज पर ‘टोल प्लाजा’

अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच ईरान ने होर्मुज को आंशिक रूप से नियंत्रित कर लिया है। अब वह इसे कानूनी रूप दे रहा है:

ईरानी संसद (Islamic Consultative Assembly) का सुरक्षा पैनल ने प्लान पास किया, जिसमें टोल फीस, सुरक्षा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और रियल-आधारित शुल्क व्यवस्था शामिल है।

IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) पहले से ही “de facto toll booth” चला रहा है — कुछ जहाजों से 20 लाख डॉलर तक शुल्क लिया जा रहा है।

चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे “मित्र” देशों के जहाजों को समन्वय के बाद पास किया जा रहा है (जैसा हाल ही में छह बांग्लादेशी जहाजों के साथ हुआ)।

अमेरिका और इजरायल से जुड़े जहाजों पर सख्त प्रतिबंध।

कुछ भुगतान युआन (चीनी मुद्रा) में हो रहे हैं, जो डॉलर की दबदबे को चुनौती दे सकता है।

ईरान इसे अपनी संप्रभुता और सुरक्षा प्रदान करने का हक बता रहा है, जबकि आलोचक इसे “शेकडाउन” या जबरन वसूली कह रहे हैं।

ईरान का दावा है कि वह सुरक्षा सुनिश्चित करता है, इसलिए फीस जायज है — कुछ लोग इसे सuez कैनाल मॉडल से तुलना कर रहे हैं, हालांकि होर्मुज एक प्राकृतिक जलमार्ग है, न कि कृत्रिम नहर।

क्या होगा असर?

तेल की कीमतें: होर्मुज से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है। टोल बढ़ने से शिपिंग लागत और बीमा प्रीमियम बढ़ेंगे, जिसका असर भारत समेत आयातक देशों पर पड़ेगा।

वैश्विक व्यापार: पहले से युद्ध के कारण तेल आपूर्ति प्रभावित है, अब टोल से और महंगाई का खतरा।

कूटनीतिक तनाव: अमेरिका और पश्चिमी देश इसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग के सिद्धांत (freedom of navigation) का उल्लंघन मान रहे हैं। भारत ने भी ऐसे कदम को निराधार बताया है।

ईरान के लिए फायदा: युद्ध के बीच अतिरिक्त राजस्व, लेकिन लंबे समय में और संघर्ष बढ़ सकता है।

डेनमार्क का Sound Dues सिस्टम सदियों तक चला क्योंकि उस समय maritime शक्ति संतुलन अलग था। आज के दौर में होर्मुज पर ऐसा मॉडल कितना टिकाऊ होगा, यह अंतरराष्ट्रीय दबाव, अमेरिकी-इजरायली जवाब और बाजार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। ट्रंप समेत कई नेता पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि होर्मुज को मुक्त रखना जरूरी है।

फिलहाल होर्मुज में ट्रैफिक धीमा है, लेकिन चुनिंदा जहाज टोल देकर गुजर रहे हैं। स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है — एक गलत कदम पूरे क्षेत्र को और अस्थिर कर सकता है।

(यह विश्लेषण हालिया ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स, Lloyd’s List, AP, NYT और ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। युद्ध की स्थिति तेजी से बदल रही है।)

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