उत्तराखंड

उत्तराखंड निर्वाचन आयोग की रडार पर 18 लाख मतदाता: प्री-SIR मैपिंग में फंसे पेंच

उत्तराखंड में आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के शुद्धिकरण को लेकर चल रही प्री-स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (Pre-SIR) की प्रक्रिया ने राज्य में सियासी और प्रशासनिक हलचल तेज कर दी है। निर्वाचन आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन 18 लाख मतदाताओं का ‘इतिहास’ खोजना है, जिनका रिकॉर्ड साल 2003 की वोटर लिस्ट में नहीं मिल रहा है।

उत्तराखंड निर्वाचन आयोग की रडार पर 18 लाख मतदाता: प्री-SIR मैपिंग में फंसे पेंच

निर्वाचन आयोग प्रदेश भर में मिशन मोड पर मतदाताओं की मैपिंग कर रहा है, लेकिन ताजा आंकड़ों ने आयोग की चिंता बढ़ा दी है। राज्य के कुल 84.19 लाख मतदाताओं में से केवल 65.45 लाख मतदाताओं का ही सत्यापन (Verification) बीएलओ के माध्यम से हो पाया है।

प्रमुख आंकड़े: मैपिंग की मौजूदा स्थिति

| विवरण | संख्या / प्रतिशत |

| कुल मतदाता (उत्तराखंड) | 84,19,008 |

| सत्यापित मतदाता (BLO द्वारा) | 65,45,657 |

| रिकॉर्ड से बाहर मतदाता | लगभग 18.73 लाख |

| लक्ष्य का आधार वर्ष | 2003 की मतदाता सूची |

मैदानी क्षेत्रों में ‘गायब’ मतदाताओं की बाढ़

रिपोर्ट के अनुसार, मैदानी विधानसभा सीटों पर स्थिति सबसे खराब है। देहरादून की धर्मपुर विधानसभा इस सूची में शीर्ष पर है, जहाँ 2.22 लाख मतदाताओं में से केवल 50% का ही रिकॉर्ड 2003 की सूची से मिल पाया है।

कम मैपिंग वाली प्रमुख विधानसभाएं:

* ऋषिकेश: 53.36%

* राजपुर रोड: 54.46%

* कैंट: 54.70%

* मसूरी: 56.5%

* रुद्रपुर: 57.55%

* रायपुर: 58.57%

* 70% से कम वाले क्षेत्र: बाजपुर, किच्छा, डोईवाला, विकासनगर, सहसपुर और हरिद्वार।

जिलों की स्थिति: देहरादून सबसे पीछे

राज्य के तीन प्रमुख जिलों में 80% से भी कम मैपिंग हो सकी है:

* देहरादून: 61.22% (सबसे खराब स्थिति)

* ऊधम सिंह नगर: 67.14%

* नैनीताल: 77.47%

कारण: जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड बनने के बाद उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से भारी पलायन देहरादून और मैदानी जिलों की ओर हुआ। साथ ही पर्वतीय जिलों से भी लोग मैदानों में बसे, जिसके कारण उनका 2003 का रिकॉर्ड मिलना मुश्किल हो रहा है।

सियासी घमासान: सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष

इस प्रशासनिक प्रक्रिया पर अब राजनीतिक रंग भी चढ़ने लगा है:

* सरकार का पक्ष: जनगणना मंत्री मदन कौशिक का कहना है कि अप्रैल से मुख्य SIR शुरू होगा और 31 मार्च के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ होगी। वहीं मुख्य निर्वाचन अधिकारी बीवीआरसी पुरुषोत्तम ने कहा कि जिनका रिकॉर्ड नहीं मिला है, उनसे 2003 की स्थिति के बारे में पूछा जाएगा।

* विपक्ष का आरोप: कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत ने इसे भाजपा की साजिश करार दिया है। उनका दावा है कि कर्मचारियों पर नाम हटाने का दबाव बनाया जा रहा है ताकि चुनावी नतीजों को प्रभावित किया जा सके। कांग्रेस का कहना है कि जहां जीत-हार का अंतर 1000 वोटों से कम होता है, वहां लाखों वोटर्स का रिकॉर्ड न मिलना गंभीर संकेत है।

अगला कदम

निर्वाचन आयोग के लिए 31 मार्च की समयसीमा बेहद महत्वपूर्ण है। इसके बाद अप्रैल से शुरू होने वाले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में इन 18 लाख संदिग्ध नामों पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *