राजनीति

कांशीराम को ‘भारत रत्न’ पर छिड़ी जंग: राहुल की मांग पर मायावती का करारा जवाब; पुराने जख्मों को किया ताजा

राहुल गांधी ने अपनी रैली के दौरान कांशीराम जी के लिए ‘भारत रत्न’ की मांग की थी, और आज सुबह मायावती ने सोशल मीडिया के जरिए उस पर कड़ा पलटवार किया है।

कांशीराम को ‘भारत रत्न’ पर छिड़ी जंग: राहुल की कल की मांग पर मायावती का आज का करारा जवाब; पुराने जख्मों को किया ताजा

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर ‘दलित मसीहा’ और ‘बहुजन नायक’ के सम्मान को लेकर घमासान शुरू हो गया है। कल (शुक्रवार) को कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा मान्यवर कांशीराम को ‘भारत रत्न’ देने की वकालत करने के बाद, आज (शनिवार) बसपा प्रमुख मायावती ने इस पर तीखा हमला बोला है। मायावती ने कांग्रेस को उनके शासनकाल के दौरान दलित महापुरुषों के साथ किए गए ‘सौतेले व्यवहार’ की याद दिलाई है।

कल का घटनाक्रम: राहुल गांधी का बड़ा दांव

कल एक जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने दलित कार्ड खेलते हुए केंद्र सरकार को घेरा था। उन्होंने कहा था:

* “कांशीराम जी ने देश के करोड़ों वंचितों को सिर उठाकर जीना सिखाया। उन्हें अब तक ‘भारत रत्न’ न मिलना देश के एक बड़े वर्ग का अपमान है।”

* राहुल ने यह भी दावा किया कि कांग्रेस अब दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की असली हितैषी है और सत्ता में आने पर उन्हें उनका हक दिलाएगी।

आज का पलटवार: मायावती ने दिखाया कांग्रेस को आईना

आज सुबह मायावती ने लखनऊ में मीडिया से बात करते हुए राहुल गांधी की इस मांग को ‘चुनावी नौटंकी’ करार दिया। उन्होंने तथ्यों के साथ कांग्रेस पर कई गंभीर आरोप लगाए:

* राजकीय शोक का अपमान: मायावती ने आज फिर याद दिलाया कि जब 9 अक्टूबर 2006 को मान्यवर कांशीराम का निधन हुआ था, तब केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार थी। उस समय कांग्रेस ने एक दिन का राजकीय शोक तक घोषित नहीं किया था और न ही उनके अंतिम संस्कार में उचित सम्मान दिया गया था।

* अंबेडकर का उदाहरण: उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर को भी उनके जीवनकाल में कभी सम्मानित नहीं किया। उन्हें भारत रत्न तब मिला जब केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार (V.P. सिंह की सरकार) सत्ता में आई, जिसे BSP ने समर्थन दिया था।

* दोहरा मापदंड: मायावती का कहना है कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब उन्हें कांशीराम जी की याद नहीं आई, और अब जब वे अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, तो वे दलित महापुरुषों का सहारा ले रहे हैं।

गहराता राजनीतिक संकट: क्यों है यह मुद्दा अहम?

इस जुबानी जंग के पीछे केवल सम्मान की बात नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों का बड़ा गणित छिपा है:

* दलित वोट बैंक पर नजर: उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक फिलहाल बिखरा हुआ है। कांग्रेस इसे अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही है, जबकि मायावती अपने इस ‘कोर बेस’ को बचाने के लिए आक्रामक रुख अपना रही हैं।

* संविधान बनाम इतिहास: जहाँ राहुल गांधी वर्तमान में ‘संविधान की रक्षा’ का मुद्दा उठा रहे हैं, वहीं मायावती कांग्रेस के ‘इतिहास’ को कुरेदकर यह साबित करना चाहती हैं कि कांग्रेस कभी भी दलितों की शुभचिंतक नहीं रही।

निष्कर्ष

यह स्पष्ट है कि राहुल गांधी की कल की मांग और मायावती का आज का जवाब आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति को और अधिक ध्रुवीकृत (Polarize) करेगा। मायावती का यह रुख संकेत देता है कि वह किसी भी हाल में कांग्रेस को बहुजन राजनीति के क्षेत्र में पैर नहीं जमाने देंगी।

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