उत्तराखंड

ईरान युद्ध का असर: उत्तराखंड में कमर्शियल सिलेंडर की किल्लत, होटलों में ‘मेनू’ छोटा, चूल्हे ठंडे होने की नौबत

ईरान युद्ध का असर: उत्तराखंड में कमर्शियल सिलेंडर की किल्लत, होटलों में ‘मेनू’ छोटा, चूल्हे ठंडे होने की नौबत

ईरान और इजरायल के बीच छिड़े भीषण युद्ध की तपिश अब उत्तराखंड के पहाड़ों तक पहुँच गई है। खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव और ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ (Strait of Hormuz) के बंद होने से भारत में एलपीजी (LPG) की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा उत्तराखंड के होटल और रेस्टोरेंट कारोबारियों को भुगतना पड़ रहा है।

प्रमुख संकट: सप्लाई में कटौती और राशनिंग

केंद्र सरकार द्वारा घरेलू रसोई गैस (Domestic LPG) की आपूर्ति को प्राथमिकता देने के कारण कमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई में भारी कटौती की गई है।

* सप्लाई चेन ब्रेक: राज्य के मुख्य शहरों जैसे देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार और ऋषिकेश में कमर्शियल सिलेंडरों की किल्लत 40% से अधिक बढ़ गई है।

* बुकिंग में देरी: डिस्ट्रीब्यूटर्स का कहना है कि स्टॉक की कमी के चलते नए ऑर्डर की डिलीवरी में 5 से 7 दिनों का समय लग रहा है।

* कालाबाजारी का डर: किल्लत के बीच सिलेंडरों की ऊँची कीमतों और कालाबाजारी की खबरें भी सामने आ रही हैं।

होटल-रेस्टोरेंट कारोबारियों की मुश्किलें

उत्तराखंड का पर्यटन उद्योग, जो पूरी तरह से खान-पान और आतिथ्य पर टिका है, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित है।

* छोटा हुआ खाने का मेनू: कई रेस्टोरेंट्स ने अपने मेनू से उन डिशेज को हटा दिया है जिन्हें पकाने में ज्यादा समय और गैस लगती है। तंदूरी आइटम और धीमी आंच पर पकने वाली दालें कई जगहों पर परोसना बंद कर दी गई हैं।

* लागत में बढ़ोतरी: कमर्शियल सिलेंडर के दाम बढ़ने और सप्लाई न मिलने से खाने की थाली महंगी हो गई है।

* विकल्प की तलाश: गैस न मिलने की स्थिति में कुछ ढाबा संचालक पारंपरिक कोयले और लकड़ी के चूल्हों की ओर लौटने को मजबूर हैं।

“अगर सप्लाई जल्द बहाल नहीं हुई, तो हमें अपने रेस्टोरेंट के वर्किंग ऑवर्स घटाने पड़ेंगे। बिना गैस के हम ग्राहकों को गर्म खाना नहीं दे सकते।” – अध्यक्ष, स्थानीय होटल एसोसिएशन

सरकार का कदम: ‘लकड़ी’ बनेगा सहारा?

हालात को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। प्रदेश के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने निर्देश दिए हैं कि यदि गैस संकट और गहराता है, तो वन विकास निगम के माध्यम से व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए ‘ईंधन की लकड़ी’ (Firewood) की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए ताकि कारोबार पूरी तरह ठप न हो।

 

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