भारत में पहली बार इच्छामृत्यु को मिली इजाजत: जानिए क्या होता है Euthanasia और दुनिया में कानून की स्थिति
भारत में पहली बार इच्छामृत्यु को मिली इजाजत: सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा केस में पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी, जानिए क्या होता है Euthanasia और दुनिया में कानून की स्थिति
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (11 मार्च 2026) को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें पहली बार किसी व्यक्ति के लिए पैसिव यूथेनेशिया (passive euthanasia) की अनुमति दी गई। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने हरीश राणा (32 वर्ष) के परिवार की याचिका मंजूर की, जो 2013 से परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (permanent vegetative state) में हैं। कोर्ट ने लाइफ सपोर्ट (वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब आदि) हटाने की इजाजत दी, जिससे मौत प्राकृतिक रूप से हो सके। यह फैसला 2018 के कॉमन कॉज जजमेंट के गाइडलाइंस पर आधारित है, जहां राइट टू डाई विद डिग्निटी को अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का हिस्सा माना गया था। जस्टिस पारदीवाला ने फैसला पढ़ते हुए शेक्सपियर के “To be or not to be” का जिक्र किया और कहा कि यह मानवीय पीड़ा पर आधारित फैसला है।
Euthanasia क्या होता है?
Euthanasia (इच्छामृत्यु या mercy killing) का मतलब है असाध्य बीमारी या असहनीय पीड़ा में किसी व्यक्ति की जान लेना या मौत होने देना, ताकि दर्द से मुक्ति मिले। यह दो मुख्य प्रकारों में बंटा है:
एक्टिव यूथेनेशिया (Active Euthanasia): डॉक्टर या कोई व्यक्ति सीधे मौत का कारण बनता है, जैसे लीथल इंजेक्शन देना। यह भारत में पूरी तरह अवैध है और हत्या या culpable homicide माना जाता है (Bharatiya Nyaya Sanhita के तहत)।
पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia): लाइफ-सपोर्ट ट्रीटमेंट (वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब, दवाएं) रोकना या न देना, जिससे मौत प्राकृतिक रूप से हो। यह भारत में कुछ शर्तों के साथ वैध है, लेकिन सख्त गाइडलाइंस हैं:
मरीज टर्मिनल/इररिवर्सिबल स्थिति में हो।
दो मेडिकल बोर्ड की राय (एक सरकारी, एक प्राइवेट)।
परिवार/लाइविंग विल की सहमति।
हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी (कुछ मामलों में)।
2018 के जजमेंट में लिविंग विल (advance directive) को मान्यता दी गई, जिसे 2023 में सरल बनाया गया।
हरीश राणा का केस भारत में पहला ऐसा है जहां सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के गाइडलाइंस को लागू कर पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। इससे पहले अरुणा शानबाग (2011) और कॉमन कॉज (2018) जैसे केस में सिर्फ सिद्धांत बने थे, लेकिन कोई व्यक्तिगत केस में लागू नहीं हुआ था।
दुनिया में Euthanasia के कानून (2026 तक की स्थिति)
दुनिया में एक्टिव यूथेनेशिया और असिस्टेड सूसाइड (physician-assisted suicide) के कानून अलग-अलग हैं। लगभग 10-12 देशों में एक्टिव रूप वैध है, जबकि पैसिव कई जगहों पर मान्य है:
एक्टिव यूथेनेशिया वैध (पूर्ण या आंशिक रूप से):
नीदरलैंड्स (2002 से) — सबसे पहले कानूनी बनाया।
बेल्जियम (2002 से) — बच्चों के लिए भी कुछ शर्तों में।
लक्जमबर्ग (2009 से)।
स्पेन (2021 से)।
कनाडा (2016 से, MAiD – Medical Assistance in Dying)।
कोलंबिया (2015 से)।
इक्वाडोर (2024 से, कोर्ट रूलिंग)।
न्यूजीलैंड (2021 से)।
ऑस्ट्रेलिया के सभी 6 राज्य (2017-2019 से विभिन्न)।
उरुग्वे (2025 से, हाल ही में पास)।
पुर्तगाल (2023 में पास, लेकिन अभी लागू नहीं)।
केवल पैसिव यूथेनेशिया या असिस्टेड सूसाइड वैध: स्विट्जरलैंड (असिस्टेड सूसाइड, 1942 से), जर्मनी (2020 से असिस्टेड सूसाइड), ऑस्ट्रिया (2022 से)।
भारत: केवल पैसिव यूथेनेशिया वैध (2018 से गाइडलाइंस), एक्टिव अवैध।
अमेरिका: 10+ राज्य (जैसे ओरेगन 1997 से) में असिस्टेड सूसाइड वैध, लेकिन एक्टिव नहीं।
अधिकांश देशों में: दोनों प्रकार अवैध (जैसे चीन, रूस, ज्यादातर एशिया/अफ्रीका)।
यह फैसला भारत में राइट टू डाई विद डिग्निटी की बहस को नई दिशा देगा। कोर्ट ने केंद्र से यूथेनेशिया पर व्यापक कानून बनाने को कहा है। हरीश राणा के परिवार के लिए यह राहत है, लेकिन समाज में नैतिक, धार्मिक और कानूनी बहस जारी रहेगी।
