उत्तराखंड

उत्तराखंड में फॉरेस्ट फायर सीजन: 15 फरवरी से 15 जून तक हाई अलर्ट, हरे पेड़ों की कटाई से फायर लाइन तैयार – विभाग का तर्क ‘बचाव के लिए जरूरी बलि’

उत्तराखंड में फॉरेस्ट फायर सीजन: 15 फरवरी से 15 जून तक हाई अलर्ट, हरे पेड़ों की कटाई से फायर लाइन तैयार – विभाग का तर्क ‘बचाव के लिए जरूरी बलि’

उत्तराखंड के जंगलों में हर साल की तरह इस बार भी वनाग्नि (फॉरेस्ट फायर) का खतरा बढ़ रहा है। वन विभाग ने 15 फरवरी 2026 से 15 जून 2026 तक के फॉरेस्ट फायर सीजन को लेकर तैयारियां तेज कर दी हैं। इस दौरान राज्य में गर्मी, सूखी पत्तियां (खासकर चीड़ की), तेज हवाएं और पहाड़ी इलाकों की वजह से आग तेजी से फैलती है। पिछले सालों में लाखों हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुए, जैव विविधता को नुकसान पहुंचा और कई बार जनहानि भी हुई।

मुख्य तैयारियां क्या हैं?

फायर लाइन का काम युद्धस्तर पर: राज्य में कुल 13,000 किलोमीटर क्षेत्र में फायर लाइन (जंगल में खाली पट्टियां जहां पेड़-पौधे नहीं होते, आग फैलने से रोकने के लिए) को व्यवस्थित किया जा रहा है। कई जगह पुरानी फायर लाइन झाड़ियों और पेड़ों से भर चुकी हैं, इसलिए उन्हें फिर से उपयोगी बनाने के लिए हरे-भरे पेड़ों को चिन्हित कर काटने की योजना है।

विभाग का दावा: केवल जरूरत के हिसाब से कटाई होगी, बड़े पैमाने पर नहीं। जितने पेड़ कटेंगे, उससे ज्यादा आग से बचाए जाएंगे।

उदाहरण: चमोली जिले में पहले ही केंद्र की अनुमति से 5,184 पेड़ काटकर 20 किमी लंबी और 20 मीटर चौड़ी फायर लाइन बनाने का काम चल रहा है।

बहु-विभागीय समन्वय: इस बार वन विभाग अकेला नहीं लड़ेगा। 20+ विभागों (आपदा प्रबंधन, पुलिस, राजस्व, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य, ऊर्जा, स्थानीय प्रशासन आदि) को जोड़ा गया है। समन्वय से त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित होगी।

13 फरवरी को राज्य स्तर पर मॉक ड्रिल: फायर सीजन शुरू होने से पहले तैयारियों की जांच के लिए बड़ा मॉक ड्रिल आयोजित किया जा रहा है।

तकनीक और अन्य उपाय

सैटेलाइट अलर्ट सिस्टम, ड्रोन सर्विलांस, और रियल-टाइम मॉनिटरिंग से आग लगते ही तुरंत जानकारी मिलेगी।

फायर स्टेशन, कर्मचारियों के लिए बीमा कवर, सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षण और अतिरिक्त कर्मियों की तैनाती।

बजट: आपदा मद, राज्य सरकार और विभागीय संसाधनों से सभी डिवीजनों को पर्याप्त फंड जारी कर दिया गया है।

विवाद का मुद्दा: हरे पेड़ों की कटाई

वन विभाग का तर्क है कि फायर लाइन के बिना आग रोकना मुश्किल है, और पुरानी लाइनें बेकार हो चुकी हैं। लेकिन पर्यावरणविदों और कुछ स्थानीयों में चिंता है कि हरे पेड़ काटना पर्यावरण संरक्षण के खिलाफ है। विभाग ने आश्वासन दिया है कि कटाई न्यूनतम और जरूरी होगी।

उत्तराखंड में जंगल की आग एक बड़ी समस्या बनी हुई है—2025-26 में भी जनवरी में ही सैकड़ों घटनाएं दर्ज हुईं। विभाग की ये आक्रामक तैयारियां उम्मीद जगाती हैं कि इस बार नुकसान कम होगा।

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