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Maha Shivaratri 2026: मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में दूसरा, जानिए पूरी कहानी

Maha Shivaratri 2026: मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में दूसरा, जानिए पूरी कहानी

महाशिवरात्रि 2026 की तिथि: महाशिवरात्रि 15 फरवरी 2026 (रविवार) को मनाई जाएगी। यह फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर पड़ती है। निशिता काल पूजा का समय रात लगभग 12 बजे के आसपास होता है, और व्रत 15 फरवरी को रखा जाता है (कुछ स्थानों पर 16 फरवरी तक प्रभावी)। यह रात भगवान शिव की आराधना, व्रत, जागरण और बिल्वपत्र चढ़ाने के लिए विशेष मानी जाती है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का स्थान और महत्व:

भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में दूसरा स्थान मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का है। यह आंध्र प्रदेश के नंदयाल जिले (पहले कृष्णा जिला) में श्रीशैलम (श्रीपर्वत) पर स्थित है। मंदिर कृष्णा नदी के किनारे पहाड़ी पर है और इसे दक्षिण का कैलाश भी कहा जाता है।

यह ज्योतिर्लिंग शिव पुराण और स्कंद पुराण में वर्णित है। यहां भगवान शिव (मल्लिकार्जुन) और माता पार्वती (भ्रमारांबा) दोनों एक साथ विराजमान हैं। यह एकमात्र ऐसा स्थान है जहां ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ (भ्रमारांबा देवी का पीठ) साथ हैं। दर्शन से मनोकामनाएं पूरी होती हैं, पाप नष्ट होते हैं और परिवारिक सुख-शांति मिलती है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की पूरी पौराणिक कहानी:

शिव पुराण के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश और कार्तिकेय में विवाद हुआ कि दोनों में से पहले किसका विवाह होगा। माता-पिता ने फैसला किया कि जो सबसे पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा, वही बड़ा माना जाएगा और पहले उसका विवाह होगा।

कार्तिकेय अपने मोर वाहन पर तुरंत दुनिया की परिक्रमा करने निकल पड़े। लेकिन गणेश जी ने बुद्धि से काम लिया — उन्होंने माता-पिता (शिव-पार्वती) की ही परिक्रमा की और कहा, “आप ही मेरी पूरी दुनिया हैं, इसलिए मैंने आपकी परिक्रमा कर ली।” इस तरह गणेश जी को पहले विवाह का अधिकार मिल गया।

कार्तिकेय जब लौटे तो यह देखकर क्रोधित हो गए। वे माता-पिता से नाराज होकर श्रीशैल पर्वत (क्रौंच पर्वत) पर चले गए और तपस्या करने लगे। पुत्र के वियोग से दुखी होकर भगवान शिव और माता पार्वती भी वहां पहुंचे। वे कार्तिकेय को मनाने की बहुत कोशिश करते रहे, लेकिन कार्तिकेय दूर चले जाते थे।

अंत में पुत्र स्नेह और वात्सल्य में भगवान शिव ने ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर श्रीशैल पर्वत पर निवास किया। मल्लिका का अर्थ पार्वती (jasmine flower से जुड़ा नाम) और अर्जुन का अर्थ शिव है। इसलिए इस ज्योतिर्लिंग का नाम मल्लिकार्जुन पड़ा। यह स्थान शिव-पार्वती के परिवारिक प्रेम, वात्सल्य और एकता का प्रतीक बन गया।

कहते हैं कि यहां पूजा करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य मिलता है और सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।

महाशिवरात्रि पर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग में लाखों भक्त दर्शन के लिए आते हैं। यदि आप जा रहे हैं, तो बिल्वपत्र, दूध, धतूरा और भांग चढ़ाकर भोलेनाथ की कृपा प्राप्त करें।

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