Thursday, September 10, 2026
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प्रेगनेंसी में दिल को संभालकर, इस दौरान होता है हार्ट अटैक का ज्यादा खतरा

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में हार्ट अटैक और कार्डियोवैस्कुलर समस्याओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों और हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में यह समस्या अब पहले से कहीं ज्यादा गंभीर हो गई है, खासकर 35 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में। डॉक्टरों की चेतावनी है कि देर से मां बनना ‘दिल’ पर भारी पड़ सकता है, और कई ‘साइलेंट’ संकेतों को अनदेखा करने से जान जोखिम में पड़ सकती है।

आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्रेग्नेंसी के दौरान हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं। 1 लाख डिलीवरी में से लगभग 3 महिलाओं को हार्ट अटैक का सामना करना पड़ रहा है, जो पहले दुर्लभ माना जाता था। द हिंदू और इंडिया टुडे जैसी रिपोर्ट्स बताती हैं कि हार्ट अटैक दुर्लभ तो हैं, लेकिन अब बढ़ रहे हैं। मुख्य कारणों में उम्र बढ़ना (35+), मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और जीवनशैली में बदलाव शामिल हैं। गर्भावस्था में शरीर में ब्लड वॉल्यूम 40% तक बढ़ जाता है, जिससे दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

35 वर्ष से अधिक उम्र में प्रेग्नेंसी का जोखिम ज्यादा होता है, क्योंकि इस उम्र में कार्डियोवैस्कुलर रोगों की प्राकृतिक संभावना बढ़ जाती है। गेस्टेशनल डायबिटीज, प्री-एक्लेम्पसिया और हाई बीपी जैसी स्थितियां न केवल प्रेग्नेंसी को हाई-रिस्क बनाती हैं, बल्कि भविष्य में हार्ट फेलियर या हार्ट अटैक का खतरा भी 4 गुना तक बढ़ा सकती हैं। वैश्विक अध्ययनों में भी पाया गया है कि पिछले दो दशकों में प्रेग्नेंसी से जुड़ी कार्डियोवैस्कुलर जटिलताएं बढ़ी हैं, और भारत में भी यही ट्रेंड दिख रहा है।

लक्षणों को नजरअंदाज न करें

प्रेग्नेंसी में हार्ट अटैक के संकेत अक्सर सामान्य गर्भावस्था लक्षणों जैसे थकान, सांस फूलना, सीने में हल्का दर्द, चक्कर आना, मतली या पीठ दर्द से मिलते-जुलते होते हैं। महिलाओं में ये ‘साइलेंट’ या असामान्य तरीके से दिखते हैं, इसलिए इन्हें ‘नॉर्मल’ समझकर इग्नोर न करें।

रोकथाम और सलाह

प्रेग्नेंसी से पहले हेल्थ चेकअप करवाएं, खासकर अगर फैमिली हिस्ट्री हो।

वजन नियंत्रित रखें, संतुलित आहार लें और नियमित व्यायाम करें।

हाई बीपी, शुगर या कोलेस्ट्रॉल को मॉनिटर करें।

डॉक्टर की सलाह पर ही देर से प्रेग्नेंसी प्लान करें।

विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जागरूकता और इलाज से इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। गर्भावस्था को ‘हार्ट हेल्थ का स्ट्रेस टेस्ट’ मानकर महिलाओं को अपनी दिल की सेहत पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

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