हॉस्टल में हुई मौत ने दस साल बाद UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 के रूप में लिया जन्म
एक छात्र की हॉस्टल में हुई दर्दनाक मौत ने करीब एक दशक बाद उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए नए और सख्त नियमों का रूप ले लिया है। यह बात यूजीसी (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस) रेगुलेशंस 2026 से जुड़ी है, जिसे 13 जनवरी 2026 को लागू किया गया।
यह नियम असल में रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसी दो दुखद मौतों से प्रेरित हैं। रोहित वेमुला, हैदराबाद यूनिवर्सिटी के पीएचडी छात्र, ने 17 जनवरी 2016 को हॉस्टल में फंदे पर लटककर आत्महत्या कर ली थी। वे दलित समुदाय से थे और कथित तौर पर जातिगत भेदभाव, छात्रवृत्ति रोकने और हॉस्टल से निकाले जाने के कारण परेशान थे। इसी तरह, 2019 में मुंबई के टोपिवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज में आदिवासी छात्रा डॉ. पायल तड़वी ने हॉस्टल में आत्महत्या कर ली। उन्हें सीनियर्स द्वारा जातिगत गालियां और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था।
इन दोनों मामलों में पीड़ितों की माताओं – राधिका वेमुला और अबेदा सलीम तड़वी – ने 2019 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि 2012 के मौजूदा यूजीसी इक्विटी नियम प्रभावी नहीं हैं और जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर कार्रवाई नहीं हो रही। सुप्रीम कोर्ट ने कई सुनवाइयों के बाद यूजीसी को नए नियम बनाने का निर्देश दिया। कोर्ट ने इसे “अत्यंत दुखद” बताया और उच्च शिक्षा संस्थानों में ऐसे भेदभाव को रोकने के लिए सख्त ढांचा बनाने पर जोर दिया।
नए नियम 2026 में क्या बड़ा बदलाव?
अब SC/ST के साथ-साथ OBC छात्रों के खिलाफ जातिगत भेदभाव (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष) को अपराध माना जाएगा।
हर संस्थान में इक्विटी पैनल और शिकायत निवारण तंत्र अनिवार्य।
भेदभाव साबित होने पर कठोर सजा: जुर्माना (25,000 से 1 लाख रुपये तक), हॉस्टल/एडमिशन से निलंबन, छात्रवृत्ति रोकना, यहां तक कि संस्थान की UGC मान्यता रद्द हो सकती है।
संस्थानों को सांस्कृतिक बदलाव लाने के लिए बाध्य किया गया है, सिर्फ निगरानी नहीं।
ये नियम 2012 के पुराने नियमों को अपडेट और मजबूत करते हैं, लेकिन कुछ आलोचक कहते हैं कि यह “जनरल कैटेगरी” छात्रों पर उल्टा असर डाल सकता है या दुरुपयोग हो सकता है।
यह नियम लागू होने के बाद देशभर में बहस छिड़ गई है। कुछ इसे समानता की दिशा में बड़ा कदम मानते हैं, तो कुछ इसे “काला कानून” कहकर विरोध कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के बाद यूजीसी ने जनवरी 2026 में इन्हें अधिसूचित किया, जो वास्तव में उन दो मौतों का “पुनर्जन्म” है – एक नीति के रूप में।
आज भी उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव की कई घटनाएं सामने आती हैं। ये नियम उम्मीद जगाते हैं कि भविष्य में ऐसी कोई और “हॉस्टल मौत” न हो, लेकिन असली बदलाव समाज और संस्थानों की मानसिकता में आएगा।
