उत्तराखंड

उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में थम नहीं रहे जंगली जानवरों के हमले: आज भी जारी दहशत, भालू-तेंदुआ प्रमुख

उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में थम नहीं रहे जंगली जानवरों के हमले: आज भी जारी दहशत, भालू-तेंदुआ प्रमुख

उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। तेंदुआ (लेपर्ड), भालू और अन्य जंगली जानवरों के हमले थमने का नाम नहीं ले रहे, जिससे ग्रामीणों में दहशत का माहौल है। 2026 की शुरुआत में भी कई घटनाएं सामने आई हैं, और विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, आवास सिकुड़ना और प्राकृतिक शिकार की कमी मुख्य कारण हैं।

हालिया घटनाएं और आंकड़े

चमोली जिले में भालू हमला: 1-2 जनवरी 2026 को नंदानगर तहसील के खुनाना गांव में भेड़ें चराने गए एक ग्रामीण पर जंगली भालू ने अचानक हमला कर दिया। व्यक्ति को सिर और हाथों में गंभीर चोटें आईं, जिसके बाद उसे एयरलिफ्ट कर एम्स ऋषिकेश पहुंचाया गया। यह घटना भालू के बढ़ते आक्रामक व्यवहार को दर्शाती है।

2025 के रिकॉर्ड: पिछले साल कुल 544+ हमले दर्ज हुए, जिसमें 35 मौतें और 193+ गंभीर घायल हुए। तेंदुए के हमले सबसे ज्यादा (पौड़ी, नैनीताल, अल्मोड़ा, चमोली में), जबकि भालू से 71+ मामले और 7 मौतें। 2000 से अब तक 900+ मौतें, जिसमें तेंदुए से 543+, हाथी से 230+, बाघ से 105+ और भालू से 70+।

2026 में जारी खतरा: जनवरी में भालू हमलों का पीक सीजन (अक्टूबर-जनवरी) चल रहा है, क्योंकि कम बर्फबारी और ठंड में देरी से भालू शीतनिद्रा में नहीं जा रहे। पौड़ी जिले में भालू का सबसे ज्यादा आतंक, जहां कर्फ्यू जैसे हालात बने हुए हैं।

मुख्य प्रभावित जिले

पौड़ी गढ़वाल: सबसे हॉटस्पॉट, भालू और तेंदुए के हमलों में टॉप पर। ग्रामीण घरों से निकलने से डर रहे हैं, बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे।

चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी: भालू हमले बढ़े, महिलाएं घास काटते समय शिकार बन रही हैं।

अल्मोड़ा, नैनीताल: तेंदुए दिनदहाड़े गांवों में घुस रहे हैं।

सरकार और वन विभाग के प्रयास

मुआवजा और इलाज: मौत पर 10 लाख रुपये, घायलों के इलाज पर सरकार 15 लाख तक खर्च उठाएगी (नया शासनादेश जल्द जारी)। सियार, नीलगाय जैसे जानवरों को भी शामिल करने की तैयारी।

तकनीकी हस्तक्षेप: पिथौरागढ़ को मॉडल जिला बनाकर AI-आधारित डिवाइस लगाए जा रहे हैं—150 मीटर दूर से जानवर डिटेक्ट कर तेज आवाज या स्प्रे से भगाते हैं।

अन्य कदम: सोलर फेंसिंग, बुश कटर, जागरूकता अभियान, समस्या वाले जानवरों को ट्रैंक्विलाइज कर ट्रांसलोकेट करना। राज्य वन्यजीव बोर्ड की 22वीं बैठक (जनवरी 2026) में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सतर्कता बढ़ाने और प्रभावी कदमों के निर्देश दिए।

संसद में मुद्दा: गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी ने संसद में “कर्फ्यू जैसे हालात” बताए, बेहतर मुआवजा और विशेष प्लान की मांग की।

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि टाइगर कंजर्वेशन की सफलता से बाघ बढ़े, जिससे तेंदुए बाहर धकेले जा रहे हैं। भालू कचरा, अनुपस्थित बागों और फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। लोगों से अपील: कचरा खुले में न फेंकें, जंगल में अकेले न जाएं, और बच्चों-महिलाओं की विशेष सुरक्षा रखें। फिलहाल पहाड़ी जिलों में डर का माहौल कायम है, और लंबे समय तक समाधान की जरूरत बनी हुई है।

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