इंडिया गठबंधन की बैठक से अखिलेश यादव की दूरी: क्या यह सीट शेयरिंग के विवाद और ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ का संकेत है?
इंडिया गठबंधन की बैठक से अखिलेश यादव की दूरी: क्या यह सीट शेयरिंग के विवाद और ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ का संकेत है?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों की लामबंदी के तहत दिल्ली में बुलाई गई ‘इंडिया’ गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक में समाजवादी पार्टी (सपा) के शीर्ष नेतृत्व का शामिल न होना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। इस बैठक में सपा ने अपने दो सांसदों (हरेंद्र मलिक और मोहिबुल्ला नदवी) को जरूर भेजा, लेकिन पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव या उनके परिवार का कोई अन्य बड़ा चेहरा इसमें शामिल नहीं हुआ।
अखिलेश यादव की अनुपस्थिति और व्यस्तता के मायने:
तर्कों और व्यस्तता पर सवाल: हालांकि सपा की ओर से व्यस्तता का हवाला दिया गया था, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अखिलेश यादव चाहते, तो वे अपनी अन्य बैठकों या नामांकन के समय को समायोजित कर सकते थे। उसी दिन सपा प्रत्याशियों के नामांकन और प्रेस कॉन्फ्रेंस के बीच उनके पास बैठक में शामिल होने या वर्चुअली जुड़ने का विकल्प था।
प्रेशर पॉलिटिक्स की चर्चा: इसे महज व्यस्तता न मानकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा के बीच चल रही तनातनी और ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ का हिस्सा माना जा रहा है।
यूपी में कांग्रेस और सपा के बीच सीट शेयरिंग पर खींचतान:
सपा और कांग्रेस के बीच हाल के दिनों में सीटों के बंटवारे और हिस्सेदारी को लेकर लगातार बयानबाजी और मतभेद सामने आए हैं:
बराबरी और हिस्सेदारी का दावा: कांग्रेस खेमे (जैसे प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और नेता इमरान मसूद) द्वारा सम्मानजनक हिस्सेदारी और बराबरी की मांग पर लगातार बयान दिए जा रहे हैं।
’जीत ही आधार’: दूसरी ओर, अखिलेश यादव ने स्पष्ट कर दिया है कि “जीत ही सीट का आधार है”। सपा नेताओं का साफ कहना है कि यदि कांग्रेस को बड़ी संख्या में सीटें चाहिए, तो उसे पहले अपने जिताऊ उम्मीदवारों की सूची पार्टी के सामने रखनी होगी।
विपक्षी तंज: सुभासपा प्रमुख और मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अखिलेश यादव की इस दूरी पर सवाल उठाए हैं, जिससे राजनीतिक पारा और चढ़ गया है।
क्या गठबंधन पर पड़ेगा असर?
आगामी चुनावों को देखते हुए उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस का यह गठबंधन काफी अहम माना जा रहा है। हालांकि, सीट शेयरिंग के फॉर्मूले, उम्मीदवारों के चयन और आपसी बयानबाजी को लेकर दोनों दलों के बीच बनी यह खींचतान आने वाले दिनों में गठबंधन के भविष्य पर क्या असर डालेगी, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
