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ब्रिक्स का विस्तार: भारत-चीन दृष्टिकोण से बदलता वैश्विक दक्षिण

ब्रिक्स का विस्तार: भारत-चीन दृष्टिकोण से बदलता वैश्विक दक्षिण

नई दिल्ली | 14 सितंबर 2026

भारत की अध्यक्षता में 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने वैश्विक दक्षिण की बदलती तस्वीर को एक बार फिर रेखांकित किया है। ब्रिक्स अब मात्र पांच देशों का समूह नहीं रह गया है। यह विस्तारित रूप में लगभग आधी विश्व आबादी और क्रय शक्ति समता के आधार पर वैश्विक जीडीपी के करीब 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।

विस्तार की यात्रा

मूल ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) में 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हुए। जनवरी 2025 में इंडोनेशिया पूर्ण सदस्य बना। सऊदी अरब को 2023 में निमंत्रण मिला था, लेकिन उसकी औपचारिक सदस्यता की स्थिति अभी भी अस्पष्ट बनी हुई है। आधिकारिक स्रोतों में अक्सर इसे 11 सदस्यीय समूह माना जाता है।

इसके अलावा, साझेदार देशों की श्रेणी में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। 30 से अधिक देश पूर्ण सदस्यता या साझेदारी के लिए इच्छुक हैं।

चीन का दृष्टिकोण: वैश्विक दक्षिण की आवाज और बहुध्रुवीयता

चीन ब्रिक्स विस्तार को वैश्विक दक्षिण की सामूहिक शक्ति बढ़ाने और पश्चिमी-नेतृत्व वाली संस्थाओं के समानांतर विकल्प बनाने का माध्यम मानता है। बीजिंग का मानना है कि अधिक सदस्यों से समूह की वैधता और प्रभाव बढ़ता है। चीन इसे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण और विकासशील देशों के आधुनिकीकरण का मंच बताता है।

नए सदस्यों और साझेदार देशों के जुड़ने से चीन को मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया में अपनी पहुंच बढ़ाने का अवसर मिला है। आर्थिक पैमाने, व्यापार संबंधों और ऋण क्षमता के बल पर चीन ब्रिक्स के अंदर सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी बना हुआ है।

भारत का दृष्टिकोण: संतुलन, स्वायत्तता और पुल की भूमिका

भारत विस्तार का समर्थन करता है, लेकिन सहमति और स्पष्ट मानदंडों पर जोर देता है। नई दिल्ली नहीं चाहती कि ब्रिक्स किसी एक देश के एजेंडे का वाहक बने या स्पष्ट रूप से पश्चिम-विरोधी मंच बन जाए। भारत इसे वैश्विक शासन सुधार, विकास सहयोग और रणनीतिक स्वायत्तता का मंच मानता है।

भारत की प्राथमिकता है कि ब्रिक्स पश्चिम और वैश्विक दक्षिण के बीच पुल का काम करे। पाकिस्तान जैसी संभावित सदस्यता पर भारत सहमति और मित्रतापूर्ण संबंधों की शर्त पर अड़ा रहा। भारत ब्रिक्स के माध्यम से अफ्रीका, खाड़ी और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ संबंध मजबूत करना चाहता है, साथ ही अपनी बहु-संरेखण नीति बनाए रखना चाहता है।

बदलता वैश्विक दक्षिण और चुनौतियां

विस्तार से ब्रिक्स की आर्थिक और राजनीतिक वजन बढ़ी है। अंतर-ब्रिक्स व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। न्यू डेवलपमेंट बैंक को और मजबूत करने तथा स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण बढ़ाने पर नई दिल्ली घोषणापत्र में सहमति बनी।

लेकिन चुनौतियां भी साफ हैं। समूह की विविधता (लोकतांत्रिक और गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता जैसे ईरान-यूएई) आम सहमति बनाना कठिन बनाती है। चीन का आर्थिक दबदबा और भारत-चीन द्विपक्षीय तनाव समूह की एकजुटता को प्रभावित करते हैं।

भारत और चीन दोनों वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं, लेकिन उनके दृष्टिकोण में अंतर साफ है। चीन तेज विस्तार और वैकल्पिक व्यवस्था पर जोर देता है, जबकि भारत क्रमिक, समावेशी और संतुलित विकास चाहता है।

आगे की राह

नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में अपनाया गया घोषणापत्र वैश्विक शासन सुधार, व्यापार, जलवायु और विकास सहयोग पर केंद्रित रहा। भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स को और अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास दिखाई दिया।

वैश्विक दक्षिण अब पहले से अधिक संगठित दिख रहा है, लेकिन इसकी दिशा भारत और चीन के बीच संतुलन पर निर्भर करेगी। ब्रिक्स का विस्तार एक अवसर है, बशर्ते यह किसी एक शक्ति के प्रभुत्व का नहीं, बल्कि सामूहिक आवाज का मंच बने।

(समाचार अपडेट: 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और नई दिल्ली घोषणापत्र के आधार पर)

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