फॉरेस्ट क्लीयरेंस में अटके उत्तराखंड के 19 नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट, बॉर्डर रोड भी शामिल
फॉरेस्ट क्लीयरेंस में अटके उत्तराखंड के 19 नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट, बॉर्डर रोड भी शामिल
देहरादून: उत्तराखंड में करोड़ों रुपये की लागत से प्रस्तावित 19 राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं फॉरेस्ट क्लीयरेंस की औपचारिकताओं के कारण अटकती नजर आ रही हैं। इनमें कई सड़क परियोजनाएं अंतरराष्ट्रीय सीमा से जुड़े क्षेत्रों में हैं, जिससे इनका महत्व सामरिक दृष्टि से भी बढ़ जाता है। परियोजनाओं में हो रही देरी को देखते हुए लोक निर्माण विभाग ने वन विभाग से स्वीकृतियों की प्रक्रिया में तेजी लाने की मांग की है।
70 फीसदी वन क्षेत्र होने से बढ़ती हैं चुनौतियां
उत्तराखंड का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र में आता है। ऐसे में राज्य में सड़क समेत कई विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि प्रभावित होती है। पेड़ों के कटान और वन भूमि हस्तांतरण के लिए वन अधिनियम के तहत जरूरी स्वीकृतियां लेनी पड़ती हैं।
बड़ी परियोजनाओं में फॉरेस्ट लैंड ट्रांसफर की प्रक्रिया राज्य स्तर से आगे बढ़कर केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंचती है। इस पूरी प्रक्रिया में समय लगने के कारण कई परियोजनाओं में काम शुरू होने में देरी होती है।
देरी से बढ़ जाती है परियोजना की लागत
फॉरेस्ट क्लीयरेंस मिलने में लंबा समय लगने का असर परियोजनाओं की लागत पर भी पड़ता है। निर्माण में देरी के साथ लागत बढ़ती जाती है, जिससे सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है। इसी वजह से महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाओं की स्वीकृतियों को जल्द पूरा कराने की कोशिश की जा रही है।
PWD सचिव ने वन विभाग को लिखा पत्र
राज्य में राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ी 19 परियोजनाओं में फॉरेस्ट क्लीयरेंस की प्रक्रिया लंबित होने को लेकर लोक निर्माण विभाग के सचिव पंकज कुमार पांडे ने प्रमुख सचिव वन आर.के. सुधांशु को पत्र लिखा है। पत्र में परियोजनाओं के महत्व को देखते हुए संबंधित अधिकारियों को जरूरी दिशा-निर्देश देने और स्वीकृति प्रक्रिया में तेजी लाने का अनुरोध किया गया है।
चमोली की तीन महत्वपूर्ण सड़कें
फॉरेस्ट क्लीयरेंस से जुड़ी लंबित परियोजनाओं में चमोली जिले की तीन सड़कें शामिल हैं—
माणा-माणापास
गेल्डुंग-नीतिपास
लपथल-दोबला
इनमें से कई सड़कें चीन सीमा से लगे क्षेत्रों की ओर जाती हैं, इसलिए इनका सामरिक महत्व भी है।
उत्तरकाशी की दो परियोजनाएं
उत्तरकाशी जिले की दो सड़क परियोजनाएं भी स्वीकृति प्रक्रिया में अटकी हैं—
नीला पानी-मूलिंग ला
त्रिपणी-रंगमंच गाड़ मार्ग
पिथौरागढ़ में सबसे ज्यादा 9 सड़कें
सीमावर्ती पिथौरागढ़ जिले में सबसे ज्यादा 9 परियोजनाएं फॉरेस्ट क्लीयरेंस से प्रभावित हैं। इनमें—
मिलम-डुंग
डुंग-टोपीडुंगा
तवाघाट-सोबला राष्ट्रीय राजमार्ग (0 से 10 किमी)
तवाघाट-सोबला राष्ट्रीय राजमार्ग (10 से 15 किमी)
कालापानी-ग्रैफु गाड़
जोलिंगकोंग-विल्शा बेस
जौलजीबी-मुनस्यारी-बैजनाथ मार्ग
काली मंदिर-लिपुलेख मार्ग
उडियारी बैंड से कांदा तक का मार्ग शामिल हैं।
अल्मोड़ा, नैनीताल, देहरादून और हरिद्वार की परियोजनाएं भी लंबित
इसके अलावा अल्मोड़ा जिले की कंगारछीना-अल्मोड़ा, नैनीताल जिले की काठगोदाम-रूसी बाईपास, देहरादून जिले की ऋषिकेश बाईपास और बढ़वाला-लखवार बैंड तथा हरिद्वार जिले की पुरकाजी-लक्सर-हरिद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना भी फॉरेस्ट संबंधी औपचारिकताओं से प्रभावित हैं।
हर महीने हो रही महत्वपूर्ण परियोजनाओं की समीक्षा
लोक निर्माण विभाग के सचिव पंकज कुमार पांडे के मुताबिक, कई परियोजनाओं में वन संबंधी औपचारिकताएं पूरी होना बाकी हैं। बड़े और महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स की हर महीने समीक्षा की जाती है और संबंधित अधिकारियों से भी बातचीत की जाती है।
उन्होंने कहा कि इसी क्रम में प्रमुख सचिव वन को पत्र भेजा गया है, ताकि परियोजनाओं के महत्व को देखते हुए फॉरेस्ट क्लीयरेंस की प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके।
सीमावर्ती इलाकों से जुड़ी इन सड़क परियोजनाओं में देरी सिर्फ विकास कार्यों को प्रभावित नहीं कर रही, बल्कि परियोजनाओं की लागत बढ़ने की चुनौती भी पैदा कर रही है। ऐसे में वन स्वीकृतियों को जल्द पूरा कराना राज्य के लिए अहम माना जा रहा है।
