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आतंकियों की नई डिजिटल चाल! अश्लील वेबसाइट और एन्क्रिप्टेड ऐप से कर रहे गुप्त संचार, सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

आतंकियों की नई डिजिटल चाल! अश्लील वेबसाइट और एन्क्रिप्टेड ऐप से कर रहे गुप्त संचार, सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

नई दिल्ली: सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकी संगठनों की डिजिटल गतिविधियों को लेकर एक नई रणनीति का पता लगाया है। ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग के बाद अब आतंकियों और उनके आकाओं द्वारा गुप्त संवाद के लिए अश्लील सामग्री वाली वेबसाइटों और विशेष एन्क्रिप्टेड ऐप का इस्तेमाल किए जाने की जानकारी सामने आई है।

अधिकारियों के मुताबिक, इन माध्यमों का इस्तेमाल आतंकी संगठन और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई जम्मू-कश्मीर में अपने नेटवर्क तक निर्देश पहुंचाने के लिए कर रहे हैं। इसका मकसद पारंपरिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी से बचना है।

रियल टाइम चैट के लिए वेबसाइटों का इस्तेमाल

अधिकारियों के अनुसार, कुछ अश्लील सामग्री वाली वेबसाइटों पर रियल टाइम संवाद की सुविधा उपलब्ध होती है। इन्हीं सुविधाओं का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल कर आतंकी आका अपने संपर्कों तक संदेश पहुंचाने और गतिविधियों में समन्वय करने की कोशिश कर रहे हैं।

सुरक्षा एजेंसियां ऐसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऐप की गतिविधियों की जांच कर रही हैं, जिनका इस्तेमाल पहचान छिपाकर संवाद करने के लिए किया जा सकता है।

एन्क्रिप्टेड ऐप और गुमनाम प्लेटफॉर्म भी निगरानी में

अधिकारियों के मुताबिक, कुछ टोर-आधारित मैसेजिंग ऐप और गोपनीयता केंद्रित प्लेटफॉर्म भी जांच के दायरे में हैं। ऐसे प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं की पहचान छिपाने और संदेशों को सुरक्षित रखने जैसी सुविधाएं उपलब्ध होने के कारण सुरक्षा एजेंसियों के लिए गतिविधियों पर नजर रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

जांच में मूनचैट जैसे कुछ गुमनाम प्लेटफॉर्म का भी जिक्र किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे ऐप के अलग-अलग संस्करणों की भी जांच की जा रही है।

वीपीएन के जरिए प्रतिबंधित ऐप तक पहुंच

अधिकारियों ने बताया कि कुछ ऐसे ऐप और प्लेटफॉर्म, जिनकी भारत में पहुंच प्रतिबंधित है, उन्हें वीपीएन के जरिए इस्तेमाल किए जाने की आशंका है। वीपीएन इंटरनेट कनेक्शन के दौरान उपयोगकर्ता के आईपी पते को छिपा सकता है और डेटा को एन्क्रिप्ट कर सकता है, जिससे डिजिटल गतिविधियों की पहचान करना अधिक मुश्किल हो जाता है।

सुरक्षा एजेंसियां ऐसे नेटवर्क और संदिग्ध डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अपनी साइबर निगरानी व्यवस्था को लगातार मजबूत कर रही हैं।

युवाओं की भर्ती और कट्टरपंथ फैलाने का आरोप

अधिकारियों के मुताबिक, आतंकी संगठन जम्मू-कश्मीर में युवाओं को अपने नेटवर्क में शामिल करने और कट्टरपंथ की ओर ले जाने के लिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।

पारंपरिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की निगरानी बढ़ने के बाद आतंकियों द्वारा अपेक्षाकृत कम निगरानी वाले या अधिक गोपनीयता वाले डिजिटल माध्यमों की ओर रुख करने की बात सामने आई है।

धीमे इंटरनेट पर भी काम करने वाले ऐप

सुरक्षा अधिकारियों ने घाटी में ऐसे विशेष ऐप के इस्तेमाल का भी पता लगाया है, जो धीमे 2G या EDGE नेटवर्क पर भी काम कर सकते हैं। कुछ ऐप में पंजीकरण के लिए फोन नंबर या ईमेल की आवश्यकता नहीं होने की बात भी सामने आई है।

अधिकारियों का कहना है कि ऐसे फीचर्स उपयोगकर्ताओं की पहचान स्थापित करने और डिजिटल गतिविधियों को ट्रैक करने की प्रक्रिया को कठिन बना सकते हैं।

वर्चुअल सिम का इस्तेमाल भी जांच के दायरे में

सुरक्षा बलों की ओर से विदेशी कंपनियों द्वारा जारी वर्चुअल सिम के इस्तेमाल को रोकने के प्रयासों के दौरान भी आतंकियों की डिजिटल रणनीति सामने आई थी। जांच एजेंसियों के अनुसार, वर्चुअल सिम के जरिए ऐसे नंबर तैयार किए जा सकते हैं जिनका इस्तेमाल इंटरनेट आधारित सेवाओं के लिए किया जाता है।

इन तकनीकों के संभावित दुरुपयोग को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियां डिजिटल संचार के विभिन्न माध्यमों की निगरानी कर रही हैं।

पुलवामा हमले की जांच में भी सामने आया था वर्चुअल सिम का इस्तेमाल

वर्ष 2019 के पुलवामा आतंकी हमले की जांच के दौरान भी वर्चुअल सिम के इस्तेमाल का मामला सामने आया था। इस हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हुए थे।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की जांच में सामने आया था कि जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े हमलावरों और उनके सहयोगियों ने बड़ी संख्या में वर्चुअल सिम का इस्तेमाल किया था।

व्हाट्सऐप और अन्य लोकप्रिय ऐप से दूरी

अधिकारियों के मुताबिक, आतंकियों की डिजिटल रणनीति में बदलाव के चलते वे व्हाट्सऐप, फेसबुक मैसेंजर और सिग्नल जैसे आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले प्लेटफॉर्म के बजाय अधिक गुमनाम या विशेष संचार माध्यमों का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।

सुरक्षा एजेंसियां अब ऐसे डिजिटल नेटवर्क की पहचान करने, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने और आतंकी नेटवर्क के संचार को बाधित करने के लिए साइबर निगरानी को और मजबूत कर रही हैं।

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