निषाद आरक्षण पर फिर गरमाई यूपी की सियासत, संजय निषाद ने मंत्री पद छोड़ने की दी चेतावनी
निषाद आरक्षण पर फिर गरमाई यूपी की सियासत, संजय निषाद ने मंत्री पद छोड़ने की दी चेतावनी
लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले निषाद आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री और निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने निषाद समाज और उसकी उप-जातियों—केवट, मल्लाह और बिंद—को अनुसूचित जाति (SC) की सूची में शामिल करने की मांग दोहराई है।
संजय निषाद का कहना है कि निषाद समाज को मौजूदा OBC कोटे से अलग कर SC श्रेणी में 9 फीसदी आरक्षण दिया जाना चाहिए। उन्होंने मांग पूरी नहीं होने की स्थिति में मंत्री पद छोड़ने और सरकार से अलग राह अपनाने तक की चेतावनी दी है।
क्या है निषाद आरक्षण का मामला?
निषाद और उसकी उप-जातियों को SC सूची में शामिल करने की मांग लंबे समय से चली आ रही है। वर्ष 2012 में चंद्रशेखर निषाद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की थी कि निषाद, बिंद, मल्लाह, केवट और कश्यप को SC सूची में शामिल किया जाए।
याचिका में तर्क दिया गया था कि 1950 की अधिसूचना में मझवार जाति को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया गया है और निषाद समुदाय की कई उप-जातियों को मझवार के समान माना जाता है। याचिका में अन्य राज्यों का उदाहरण भी दिया गया था, जहां इन समुदायों को SC सूची में शामिल किए जाने का दावा किया गया।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की थी मांग?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मांग को खारिज करते हुए स्पष्ट किया था कि किसी जाति को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने या हटाने का अधिकार अदालत या राज्य सरकार के पास नहीं है।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 341 का हवाला देते हुए कहा था कि SC सूची में संशोधन का अधिकार संसद के पास है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि 1950 की अधिसूचना में मझवार को SC सूची में शामिल किया गया था, लेकिन निषाद, मल्लाह, केवट, कश्यप और बिंद का नाम उस सूची में नहीं था।
अब सरकार पर दबाव क्यों बना रहे हैं संजय निषाद?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद गेंद केंद्र और संसद के पाले में चली जाती है। यही वजह है कि संजय निषाद अब भाजपा नेतृत्व और सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
उनका तर्क है कि निषाद समाज को OBC श्रेणी में पर्याप्त लाभ नहीं मिल रहा है और OBC आरक्षण का बड़ा हिस्सा कुछ प्रभावशाली जातियों तक सीमित है। ऐसे में निषाद समुदाय को SC सूची में शामिल कर अलग आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए।
संजय निषाद का यह भी दावा है कि भाजपा ने निषाद समाज को आरक्षण देने का वादा किया था, लेकिन अभी तक इस दिशा में अपेक्षित प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है।
चुनाव से पहले क्यों अहम है मुद्दा?
उत्तर प्रदेश में निषाद समुदाय का राजनीतिक प्रभाव कई विधानसभा सीटों पर माना जाता है। ऐसे में चुनाव से कुछ महीने पहले आरक्षण का मुद्दा उठना भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
संजय निषाद की मंत्री पद छोड़ने की चेतावनी ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। अब देखना होगा कि भाजपा नेतृत्व इस मांग पर क्या रुख अपनाता है और क्या निषाद समाज को SC सूची में शामिल करने की दिशा में केंद्र स्तर पर कोई पहल होती है।
