दिल्ली विरोध प्रदर्शन में पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोपों पर RAF ने शुरू की जांच: जानिए क्या है पूरा मामला और क्या होती है पैलेट गन
दिल्ली विरोध प्रदर्शन में पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोपों पर RAF ने शुरू की जांच: जानिए क्या है पूरा मामला और क्या होती है पैलेट गन
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हाल ही में हुए प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग और पैलेट गन (Pellet Gun) के कथित इस्तेमाल को लेकर विवाद गहरा गया है। इन गंभीर आरोपों के सामने आने के बाद रैपिड एक्शन फ़ोर्स (RAF) ने मामले की आंतरिक जांच शुरू कर दी है। सूत्रों के अनुसार, शुरुआती जांच और तथ्यों के आधार पर औपचारिक ‘कोर्ट ऑफ़ इन्क्वायरी’ (Court of Inquiry) गठित करने पर विचार किया जाएगा।
1. क्या है पूरा विवाद?
यह पूरा मामला 20 जुलाई को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) द्वारा आयोजित ‘चलो संसद’ मार्च से जुड़ा है, जो कथित NEET पेपर लीक के विरोध में निकाला गया था।
गंभीर आरोप: कई मीडिया रिपोर्ट्स और मेडिकल रिकॉर्ड्स में दावा किया गया है कि प्रदर्शन के दौरान जवानों ने पैलेट गन से फायरिंग की, जिससे कई प्रदर्शनकारी घायल हुए।
पुलिस का इनकार: दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन के इस्तेमाल के दावों को पूरी तरह खारिज किया है। पुलिस का कहना है कि उनके पास न तो पैलेट गन हैं और न ही भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वे इनका उपयोग करते हैं।
घटनाक्रम की रीकंस्ट्रक्शन: RAF की पैतृक संस्था केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) ने RAF के इंस्पेक्टर जनरल को निर्देश दिया है कि वे 20 जुलाई की घटना का पूरा सीक्वेंस तैयार करें। इसमें बलों द्वारा की गई कार्रवाई और उन परिस्थितियों दोनों की जांच की जाएगी, जिनमें सुरक्षाकर्मियों पर हमले हुए थे।
2. क्या RAF के पास होती हैं पैलेट गन?
अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि RAF के दंगा-नियंत्रण उपकरणों (Riot-Control Equipment) में 12-बोर पंप-एक्शन बंदूकें (12-bore Pump-Action Guns) शामिल होती हैं, जिन्हें आम भाषा में पैलेट गन कहा जाता है।
SOP का नियम: मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के तहत इन बंदूकों का उपयोग केवल उन्हीं अत्यंत गंभीर स्थितियों में किया जा सकता है, जहाँ सुरक्षाकर्मियों की जान को भारी खतरा हो।
3. पैलेट गन: क्या होती है और कैसे काम करती है?
पैलेट गन एक विशेष प्रकार की राइफल होती है, जिसका इस्तेमाल भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ‘गैर-घातक’ (Non-Lethal) हथियार के रूप में किया जाता है।
कारतूस की क्षमता: इसके एक कारतूस में लगभग 600 धातु या रबर के छर्रे (Pellets) भरे होते हैं।
स्पीड: फायर होने पर ये छर्रे 1000 फीट प्रति सेकंड की गति से फैलते हैं।
इस्तेमाल का इतिहास: भारत में इसका सबसे प्रमुख उपयोग जम्मू-कश्मीर में हिंसक पत्थरबाजी को रोकने के लिए किया जाता रहा है।
4. पैलेट गन के इस्तेमाल से जुड़े नियम (Guidelines)
SOP के अनुसार, पैलेट गन का सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करने के लिए सख्त दिशा-निर्देश तय किए गए हैं:
न्यूनतम दूरी: इसे कम से कम 500 फीट की दूरी से ही फायर किया जाना चाहिए।
कमर के नीचे निशाना: फायर हमेशा प्रदर्शनकारियों की कमर के निचले हिस्से को निशाना बनाकर होना चाहिए ताकि गंभीर चोट न लगे।
5. पैलेट गन के खतरे और शारीरिक नुकसान
हालाँकि इसे नॉन-लीथल माना जाता है, लेकिन गलत इस्तेमाल या कम दूरी से चलाने पर यह जानलेवा और स्थायी विकलांगता का कारण बन सकता है:
आंखों पर गंभीर असर: चेहरे या आंखों पर छर्रे लगने से कॉर्निया डैमेज और रेटिना डिटैचमेंट जैसी स्थिति बनती है, जिससे आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है।
जटिल इलाज: ये छर्रे शरीर के मांस में गहरे धंस जाते हैं। सर्जरी के जरिए इन्हें बाहर निकालना बेहद मुश्किल और जटिल होता है।
अतीत के अनुभव: 2016-17 के आंदोलनों के दौरान हजारों लोग पैलेट गन की चोटों से प्रभावित हुए थे, जिनमें से कई युवाओं को स्थायी रूप से अपनी दृष्टि गंवानी पड़ी थी।
निष्कर्ष
जहाँ एक ओर मानवाधिकार संगठन और चिकित्सा विशेषज्ञ पैलेट गन को भीड़ नियंत्रण के लिए अत्यधिक खतरनाक मानते हैं, वहीं सुरक्षा बल इसे गंभीर स्थितियों में अंतिम विकल्प के रूप में देखते हैं। फिलहाल, दिल्ली में हुई घटना की निष्पक्ष जांच के बाद ही स्थिति साफ हो पाएगी कि SOP का उल्लंघन हुआ था या नहीं।
