बुलेट ट्रेन परियोजना: 2027 से स्वदेशी ‘B-28’ बुलेट ट्रेन दौड़ाने की तैयारी, जापान की देरी के बाद भारत का बड़ा फैसला
बुलेट ट्रेन परियोजना: 2027 से स्वदेशी ‘B-28’ बुलेट ट्रेन दौड़ाने की तैयारी, जापान की देरी के बाद भारत का बड़ा फैसला
मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना को लेकर सरकार ने स्थिति पूरी तरह साफ कर दी है। जापान से अत्याधुनिक E10 सीरीज की शिंकानसेन ट्रेनें मिलने में हो रही देरी के कारण, अब भारत ने साल 2027 से अपनी स्वदेशी बुलेट ट्रेन ‘B-28’ को हाई-स्पीड ट्रैक पर उतारने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। भारत और जापान के बीच आपसी सहमति से यह कदम उठाया गया है ताकि परियोजना में और अधिक देरी न हो।
जापान की E10 सीरीज में क्यों हो रही है देरी?
भारत और जापान के बीच बातचीत में यह बात सामने आई है कि जापान जिस नई पीढ़ी की E10 सीरीज हाई-स्पीड ट्रेन को भारत भेजने पर सहमत हुआ है, वह अभी वहां डेवलपमेंट (डिजाइनिंग) के चरण में है। यही वजह है कि जापान अभी तक ट्रेनों, सिग्नलिंग सिस्टम और ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर (OCC) के लिए फाइनल ऑफर नहीं दे पाया है। ये ट्रेनें भारत को 2030 के शुरुआती वर्षों (संभावित 2034 तक) में ही मिल पाएंगी। यदि भारत इसका इंतजार करता, तो प्रोजेक्ट काफी पिछड़ जाता।
स्वदेशी बुलेट ट्रेन ‘B-28’ की खासियतें
निर्माण: ‘मेक इन इंडिया’ के तहत बेंगलुरु में बीईएमएल (BEML) और इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) मिलकर इस हाई-स्पीड ट्रेन सेट को तैयार कर रहे हैं। बेंगलुरु के ‘आदित्य’ नाम के स्पेशल कॉम्प्लेक्स में इसके कोच बनाए जा रहे हैं।
रफ्तार: यह स्वदेशी बुलेट ट्रेन 250 से 280 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से पटरियों पर दौड़ेगी। (तुलना के लिए, जापान की ऑपरेशनल बुलेट ट्रेन 320 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हैं)।
क्षमता: 8 कोच वाली इस ट्रेन में कुल 560 यात्रियों के बैठने की क्षमता होगी।
15 अगस्त 2027 को शुरू होगा पहला सेक्शन
सरकार ने बुलेट ट्रेन कॉरिडोर के पहले सेक्शन (सूरत से बिलिमोरा तक) को 15 अगस्त 2027 से यात्रियों के लिए शुरू करने की समय-सीमा तय की है। चूंकि जापानी ट्रेनें 2030 के बाद ही उपलब्ध होंगी, इसलिए दोनों देशों ने शुरुआती संचालन भारतीय हाई-स्पीड ट्रेन से ही करने पर मुहर लगाई है। इस परियोजना में आईआईटी (IIT) संस्थानों की रिसर्च, स्थानीय ट्रेनिंग और जापानी इंजीनियरिंग का बेहतर तालमेल देखने को मिल रहा है।
सिग्नलिंग सिस्टम में बड़ा बदलाव और जापानी दावों की हकीकत
हाल ही में जापान के पूर्व न्याय मंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी के नेता ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि भारत के कारण प्रोजेक्ट में देरी हुई और जापान को सिग्नलिंग सिस्टम से बाहर करना ‘इंडिया शिन्कान्सेन’ की नाकामी है।
लेकिन असल सच्चाई यह है कि 508 किलोमीटर लंबे इस पूरे प्रोजेक्ट में सिविल कंस्ट्रक्शन का काम भारत पहले से ही खुद कर रहा था। अब भारत अपनी इस बुलेट ट्रेन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य यूरोपियन ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ETCS) सिग्नलिंग पर चलाएगा। इस अत्याधुनिक सिस्टम का इस्तेमाल यूरोपीय देशों के अलावा दक्षिण कोरिया, ताइवान और चीन में भी होता है। भारत की रैपिड रेल (नमो भारत) भी इसी तकनीक पर काम करती है।
भविष्य की तैयारी: देश में बुलेट ट्रेन के 7 नए रूट्स
इस स्वदेशी तकनीक के सफल होते ही भारत में भविष्य के हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट्स के लिए मैन्युफैक्चरिंग और टेस्टिंग की राह आसान हो जाएगी। सरकार ने देश में बुलेट ट्रेन के लिए इन 7 नए रूट्स की योजना भी तैयार की है:
दिल्ली – वाराणसी बुलेट ट्रेन
दिल्ली – वाराणसी – सिलीगुड़ी बुलेट ट्रेन
मुंबई – पुणे बुलेट ट्रेन
पुणे – हैदराबाद बुलेट ट्रेन
हैदराबाद – बेंगलुरु बुलेट ट्रेन
हैदराबाद – चेन्नई बुलेट ट्रेन
चेन्नई – बेंगलुरु बुलेट ट्रेन
