सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: कोविड वैक्सीन से होने वाले नुकसान के लिए केंद्र को ‘नो-फॉल्ट’ मुआवजा नीति बनाने का निर्देश
कोविड-19 के पीड़ितों और विशेष रूप से वैक्सीन के गंभीर दुष्प्रभावों (AEFI) का सामना करने वाले परिवारों के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया है। 10 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक ‘नो-फॉल्ट’ कंपेंसेशन (No-Fault Compensation) पॉलिसी बनाने का निर्देश दिया है।
यह विषय जितना राहत देने वाला है, उतना ही प्रशासनिक और कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण भी। आइए समझते हैं कि यह ‘न्याय’ की दिशा में कदम है या एक नई ‘पहेली’।
क्या है ‘नो-फॉल्ट’ कंपेंसेशन पॉलिसी?
साधारण शब्दों में, इसका मतलब है कि यदि किसी व्यक्ति को वैक्सीन के कारण गंभीर नुकसान या मृत्यु हुई है, तो उसे मुआवजा पाने के लिए कोर्ट में यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि सरकार या वैक्सीन बनाने वाली कंपनी की ‘गलती’ (Negligence) थी।
* पुरानी व्यवस्था: पीड़ित को सिविल कोर्ट में लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर ‘लापरवाही’ साबित करनी पड़ती थी।
* नई व्यवस्था: केवल यह साबित करना पर्याप्त होगा कि नुकसान वैक्सीन के प्रतिकूल प्रभाव (AEFI) के कारण हुआ है।
न्याय की दिशा में बड़ा कदम (Pros)
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले (रचना गंगू बनाम भारत संघ) को मानवीय आधार पर बहुत सराहा जा रहा है:
* कानूनी बोझ से मुक्ति: आम नागरिकों के लिए बड़ी कंपनियों या सरकार के खिलाफ लापरवाही साबित करना लगभग असंभव होता है। यह पॉलिसी उन्हें मुकदमों के मकड़जाल से बचाएगी।
* संविधानिक अधिकार: कोर्ट ने माना कि अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत स्वास्थ्य की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। यदि किसी ने व्यापक लोकहित (Public Health) के लिए वैक्सीन लगवाई, तो उसके साथ हुई किसी भी अनहोनी की जिम्मेदारी भी ‘कल्याणकारी राज्य’ की है।
* पारदर्शिता: सरकार को अब वैक्सीन के दुष्प्रभावों का डेटा समय-समय पर सार्वजनिक करना होगा, जिससे स्वास्थ्य प्रणाली में भरोसा बढ़ेगा।
* वैश्विक स्तर की नीति: अमेरिका, ब्रिटेन और जापान जैसे देशों में ऐसी व्यवस्था पहले से है। भारत का यह कदम उसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के करीब लाता है।
प्रशासनिक और कानूनी चुनौतियां (Cons/Challenges)
नीति कितनी भी अच्छी हो, धरातल पर उसकी चुनौतियां बड़ी हैं:
* कारण का निर्धारण (Causality): सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना होगी कि मृत्यु या बीमारी सिर्फ वैक्सीन की वजह से हुई, किसी अन्य पुरानी बीमारी (Comorbidity) से नहीं। इसके लिए मेडिकल बोर्ड की भूमिका जटिल हो जाएगी।
* वित्तीय बोझ: भारत जैसे विशाल देश में मुआवजे की राशि का निर्धारण और उसका भुगतान सरकारी खजाने पर बड़ा भार डाल सकता है।
* दायित्व से इनकार (No Admission of Liability): कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह मुआवजा देना सरकार की ‘गलती’ मानना नहीं है। इससे पीड़ितों को आर्थिक मदद तो मिलेगी, लेकिन ‘जवाबदेही’ तय करने की लड़ाई कमजोर पड़ सकती है।
* समानता का मुद्दा: क्या यह मुआवजा केवल वैक्सीन पीड़ितों को मिलेगा या उन कोविड पीड़ितों को भी, जिन्होंने ऑक्सीजन या बेड की कमी के कारण जान गंवाई? यह असमानता पैदा कर सकता है।
निष्कर्ष: आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश सरकार के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। यदि सरकार एक सरल, पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त पोर्टल के जरिए इस नीति को लागू करती है, तो यह भारतीय न्याय व्यवस्था में मील का पत्थर साबित होगा।
महत्वपूर्ण नोट: कोर्ट ने स्वास्थ्य मंत्रालय को जल्द से जल्द इस ढांचे को तैयार करने का आदेश दिया है। इसका लाभ 16 मार्च 2026 से प्रभावी होने की उम्मीद है।
