नई नवेली मूवी रिव्यू: यामी गौतम की हॉरर कॉमेडी में कॉमेडी दमदार, लेकिन कमजोर कहानी ने बिगाड़ा खेल
नई नवेली मूवी रिव्यू: यामी गौतम की हॉरर कॉमेडी में कॉमेडी दमदार, लेकिन कमजोर कहानी ने बिगाड़ा खेल
स्टार रेटिंग: 2/5
फिल्म: नई नवेली
रिलीज डेट: 16 अक्टूबर 2026
निर्देशक: बालाजी मोहन
शैली: हॉरर कॉमेडी
मुख्य कलाकार: यामी गौतम धर, अनुराग ठाकुर, आदिनाथ एम. कोठारे, सुनीता राजवर और मीता वशिष्ठ
बालाजी मोहन के निर्देशन में बनी ‘नई नवेली’ पारिवारिक नोकझोंक, गलतफहमियों, हॉरर और कॉमेडी को मिलाकर एक मनोरंजक कहानी पेश करने की कोशिश करती है। फिल्म की शुरुआत दिलचस्प है और शुरुआती दृश्यों में हंसी-मजाक भी अच्छा असर छोड़ता है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी अलौकिक घटनाओं और पौराणिक प्रसंगों की ओर बढ़ती है, फिल्म अपनी पकड़ खोने लगती है। कुछ कलाकार अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं, मगर कमजोर पटकथा और बिखरी हुई कहानी मनोरंजन का पूरा मौका नहीं देती।
क्या है फिल्म की कहानी?
यामी गौतम धर फिल्म में मोहिनी की भूमिका निभा रही हैं, जो शादी के बाद मेरठ स्थित अपने नए घर में आती है। उसका देवर बंटू, जिसका किरदार अनुराग ठाकुर ने निभाया है, अपनी भाभी पर शक करने लगता है। उसे लगता है कि मोहिनी जैसी दिखाई देती है, वास्तव में वैसी नहीं है। इसी शक से घर में कई मजेदार परिस्थितियां पैदा होती हैं।
शुरुआत में परिवार के सदस्यों के बीच होने वाली बहस, गलतफहमियां और एक-दूसरे की हरकतों पर प्रतिक्रियाएं कहानी को रोचक बनाती हैं। लेकिन बाद में राम-रावण की पौराणिक कथा से जुड़े काल शील नाम के पत्थर की एंट्री होती है। इसके बाद फिल्म का रुख बदल जाता है और कहानी अलौकिक घटनाओं तथा पौराणिक संघर्ष की ओर बढ़ने लगती है।
यहीं फिल्म की सबसे बड़ी समस्या सामने आती है। जिस पारिवारिक कॉमेडी से कहानी की शुरुआत होती है, वही धीरे-धीरे पीछे छूट जाती है। पौराणिक घटनाएं भी कहानी में सहजता से नहीं जुड़ पातीं, जिससे फिल्म का मनोरंजन कमजोर पड़ने लगता है।
अनुराग ठाकुर ने संभाली कॉमेडी की कमान
बंटू के किरदार में अनुराग ठाकुर फिल्म के सबसे प्रभावशाली कलाकारों में नजर आते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग अच्छी है और वह साधारण संवादों को भी अपने अंदाज से मजेदार बना देते हैं। कई दृश्यों में जब चुटकुले उतना असर नहीं छोड़ते, तब उनका अभिनय उन पलों को संभालने की कोशिश करता है।
हालांकि, बंटू के किरदार को और गहराई दी जा सकती थी। इसके बावजूद सीमित अवसरों में अनुराग अपनी छाप छोड़ने में सफल रहते हैं। फिल्म के कुछ सबसे मनोरंजक पल उन्हीं के हिस्से में आते हैं।
लेखन और निर्देशन में कहां हुई चूक?
कॉमेडी और पौराणिक कथाओं को एक साथ पेश करना एक दिलचस्प विचार हो सकता है, लेकिन ‘नई नवेली’ में दोनों के बीच सही तालमेल नहीं बन पाता। पारिवारिक दृश्य सहज लगते हैं, जबकि पौराणिक घटनाएं किसी दूसरी कहानी का हिस्सा महसूस होती हैं।
फिल्म में कई ऐसे प्रसंग भी हैं, जिनका आपसी संबंध स्पष्ट नहीं होता। घटनाओं के क्रम और किरदारों की परिस्थितियों को लेकर सवाल उठते हैं। इससे कहानी की विश्वसनीयता प्रभावित होती है और दर्शकों का ध्यान मुख्य कथानक से हटने लगता है।
निर्देशक बालाजी मोहन इन दोनों हिस्सों को एक मजबूत कहानी में पिरोने में सफल नहीं हो पाते। फिल्म की पटकथा अगर पारिवारिक रिश्तों और मोहिनी के आसपास पैदा होने वाले रहस्य पर ज्यादा ध्यान देती, तो कहानी अधिक प्रभावी हो सकती थी।
एआई विजुअल्स और तकनीकी पक्ष ने किया निराश
फिल्म में पौराणिक प्रसंगों को दिखाने के लिए इस्तेमाल किए गए एआई से तैयार विजुअल्स भी खास प्रभाव नहीं छोड़ते। कई दृश्य कृत्रिम लगते हैं और कहानी के माहौल में दर्शकों को पूरी तरह डुबो नहीं पाते।
विजुअल इफेक्ट्स की कमजोरी अलौकिक घटनाओं के प्रभाव को कम कर देती है। फिल्म के गाने भी यादगार नहीं बन पाते। वे न तो कहानी के माहौल को बेहतर करते हैं और न ही ऐसा कोई संगीत का पल देते हैं, जो फिल्म देखने के बाद याद रहे।
करीब 2 घंटे 18 मिनट की इस फिल्म को अधिक चुस्त बनाया जा सकता था। कई दृश्य कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसकी रफ्तार धीमी करते हैं।
यामी गौतम और बाकी कलाकारों का अभिनय कैसा है?
यामी गौतम धर फिल्म की केंद्रीय भूमिका में हैं, लेकिन उनके किरदार मोहिनी को पर्याप्त गहराई नहीं दी गई है। कहानी काफी हद तक उसी के इर्द-गिर्द घूमती है, फिर भी उसका व्यक्तित्व और उसकी परिस्थितियां पूरी तरह विकसित नहीं हो पातीं।
कुछ दृश्यों में यामी के भाव एक जैसे लगते हैं, जबकि परिस्थितियों के हिसाब से उनसे अलग-अलग प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा थी। हालांकि, इसकी जिम्मेदारी केवल अभिनेत्री की नहीं है। कमजोर पटकथा भी उनके किरदार को प्रभावशाली बनने का पर्याप्त अवसर नहीं देती।
राजा की भूमिका में आदिनाथ एम. कोठारे भावनात्मक दृश्यों में अपनी क्षमता दिखाते हैं, लेकिन उनकी भूमिका भी सीमित रह जाती है। सुनीता राजवर और मीता वशिष्ठ पारिवारिक माहौल को मजबूत बनाती हैं, मगर सहायक किरदारों को यादगार बनाने के लिए कहानी में पर्याप्त गुंजाइश नहीं है।
फैसला: देखें या नहीं?
‘नई नवेली’ में एक अच्छी हॉरर कॉमेडी बनने की संभावनाएं थीं। पारिवारिक नोकझोंक, रहस्य और अनुराग ठाकुर की कॉमिक टाइमिंग फिल्म को मनोरंजक बना सकती थी। लेकिन कमजोर लेखन, पौराणिक घटनाओं के साथ तालमेल की कमी और औसत तकनीकी प्रस्तुति इसके प्रभाव को कम कर देते हैं।
फिल्म के कुछ हिस्से, खासकर बंटू वाले दृश्य, मनोरंजन करते हैं। मगर ये पल पूरी कहानी की कमियों को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अगर फिल्म अपनी पारिवारिक कॉमेडी और मूल रहस्य पर अधिक ध्यान देती, तो इसका अनुभव बेहतर हो सकता था।
हमारी रेटिंग: 2/5। ‘नई नवेली’ में कुछ हंसाने वाले पल जरूर हैं, लेकिन कमजोर कहानी के कारण यह एक यादगार हॉरर कॉमेडी बनने से चूक जाती है।

