कनाडा में अलगाववाद और खालिस्तान समर्थक गतिविधियों पर ‘खालसा वॉक्स’ की रिपोर्ट, संप्रभुता को लेकर कड़ी चेतावनी
कनाडा में अलगाववाद और खालिस्तान समर्थक गतिविधियों पर ‘खालसा वॉक्स’ की रिपोर्ट, संप्रभुता को लेकर कड़ी चेतावनी
कनाडा में अलगाववाद और विदेशी राजनीतिक एजेंडे के बढ़ते प्रभाव को लेकर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित की गई है। खालसा वॉक्स की इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कनाडा अन्य देशों की संप्रभुता को चुनौती देने वाले या उसे नकारने वाले आंदोलनों को अपने यहां जगह देकर अपनी खुद की संप्रभुता की रक्षा नहीं कर सकता।
रिपोर्ट से जुड़े प्रमुख बिंदु और चिंताएं:
कनाडा की संप्रभुता और दोहरे मानदंड: रिपोर्ट में कहा गया है कि कनाडा सिखों की धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और राजनीतिक भागीदारी की रक्षा करने के साथ-साथ अलगाववादी एजेंडे को वैधता देने से बच सकता है। इसके लिए आतंकवादी संगठनों के खिलाफ घोषित प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करना और एयर इंडिया विमान बम विस्फोट के दोषियों का महिमामंडन करने वाले समूहों को मंच देने से इनकार करना आवश्यक है।
अल्बर्टा में प्रस्तावित जनमत संग्रह और खालिस्तान समर्थक रैली:
कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में 19 अक्टूबर को इस बात पर मतदान की तैयारी है कि क्या प्रांत की स्वतंत्रता के लिए बाध्यकारी जनमत संग्रह कराने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।
वहीं, एयरड्री के पास लगे विज्ञापनों के जरिए 18 अक्टूबर को एडमंटन में प्रस्तावित ‘पंजाब की स्वतंत्रता पर अल्बर्टा जनमत संग्रह’ की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है।
रिपोर्ट में इन विज्ञापनों के पीछे अमेरिका स्थित खालिस्तानी संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) का हाथ बताया गया है, जिसने कैलगरी में खालिस्तान समर्थक रैली को ‘पंजाब जनमत संग्रह’ और ‘अल्बर्टा की स्वतंत्रता’ दोनों अभियानों के मंच के रूप में इस्तेमाल किया है।
रणनीतिक जुड़ाव और कानूनी स्थिति: रिपोर्ट में कहा गया है कि एसएफजी के ये जनमत संग्रह पूरी तरह से अनौपचारिक, गैर-बाध्यकारी हैं और भारत सरकार के लिए इनका कोई कानूनी महत्व नहीं है। हालांकि, कनाडा के लिए इनके राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। यह आंदोलन पिछले चार दशकों से कनाडा की जमीन का इस्तेमाल करके भारत के खिलाफ अलगाववादी दावे को आगे बढ़ा रहा है।
घरेलू सुरक्षा के लिए खतरा: रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ऐसे अलगाववादी आंदोलन केवल उन देशों के लिए खतरा नहीं होते जिन्हें वे सीधे निशाना बनाते हैं, बल्कि उस मेजबान देश की संप्रभुता को भी चुनौती देते हैं जहां उन्हें गतिविधियां चलाने की छूट मिलती है। इससे विदेशी देशों की खुफिया और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता घरेलू सुरक्षा व्यवस्था में आ जाती है और अपने ही समुदाय के असहमत लोगों को डराने-धमकाने का माहौल बनता है।

