TMC के 20 बागी सांसदों में भी बढ़ीं दूरियां? अहम बैठक से 10 ने बनाई दूरी, अयोग्यता पर बढ़ी हलचल
TMC के 20 बागी सांसदों में भी बढ़ीं दूरियां? अहम बैठक से 10 ने बनाई दूरी, अयोग्यता पर बढ़ी हलचल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग हुए 20 सांसदों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। पार्टी से बगावत कर नेशनल सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) से जुड़ने वाले सांसदों की कोलकाता में हुई बैठक में आधे सदस्य शामिल नहीं हुए। हालांकि, बैठक में मौजूद सांसदों ने इसे आपसी मतभेद से जोड़ने वाली अटकलों को खारिज किया है। यह बैठक ऐसे समय हुई, जब दल-बदल विरोधी कानून के तहत उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय में कार्रवाई चल रही है।
कोलकाता की बैठक में 10 सांसद नहीं पहुंचे
कोलकाता के एक होटल में सुदीप बंद्योपाध्याय की ओर से बुलाई गई इस बैठक में बागी गुट के 20 में से 10 सांसद शामिल हुए। बैठक का उद्देश्य आगे की कानूनी रणनीति और राजनीतिक कदमों पर चर्चा करना था। हालांकि, आधे सांसदों की गैर-मौजूदगी ने गुट की एकजुटता को लेकर सवाल खड़े कर दिए।
बैठक में शामिल नहीं होने वालों में काकोली घोष दस्तीदार, सयानी घोष, यूसुफ पठान, माला रॉय, जून मालिया, पार्थ भौमिक, मिताली बाग, कालीपदा सोरेन, देव और असित मल के नाम शामिल हैं।
वहीं, सुदीप बंद्योपाध्याय के अलावा अबू ताहिर, खलीदुर रहमान, शर्मिला सरकार, जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया, शताब्दी रॉय, प्रसून बनर्जी, बापी हलदर, रचना बनर्जी और अरूप चक्रवर्ती बैठक में मौजूद रहे।
गैर-मौजूदगी पर सांसदों ने क्या कहा?
बैठक में शामिल सांसदों ने दावा किया कि गैर-मौजूदगी की वजह आपसी नाराजगी नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम थे।
बांकुरा के सांसद अरूप चक्रवर्ती ने बताया कि कुछ सांसद विदेश में थे, किसी के परिवार में स्वास्थ्य संबंधी परेशानी थी, जबकि कुछ अन्य बैठकों में व्यस्त थे। उन्होंने कहा कि अनुपस्थित सांसदों से फोन पर संपर्क भी किया गया था।
शर्मिला सरकार ने भी गुट में किसी तरह के मतभेद से इनकार किया। वहीं, शताब्दी रॉय ने कहा कि कौन बैठक में आया और कौन नहीं, इसे लेकर अनावश्यक अटकलें नहीं लगानी चाहिए। उनके मुताबिक, पहले से ही जानकारी थी कि कुछ सांसद अपने तय कार्यक्रमों के कारण शामिल नहीं हो पाएंगे।
रचना बनर्जी ने इस मुलाकात को पूजा से पहले आपसी मेल-मिलाप का अवसर बताया। उन्होंने कहा कि संसद में सभी सांसद अक्सर साथ मिलते हैं, लेकिन बंगाल लौटने के बाद अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों के काम में व्यस्त हो जाते हैं।
अयोग्यता नोटिस का जवाब देने के लिए मांगा और समय
इस बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि बागी सांसदों को लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय से मिले नोटिस का जवाब देने के लिए निर्धारित दो सप्ताह की समय-सीमा गुरुवार को समाप्त हो गई।
टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पहले समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया था कि बागी सांसद जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगने पर विचार कर रहे हैं।
नोटिस में सांसदों से पूछा गया है कि उन्होंने टीएमसी क्यों छोड़ी और एनसीपीआई से क्यों जुड़े। साथ ही, उनसे यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि उनके खिलाफ दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए।
इससे पहले बागी सांसदों ने सितंबर में जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा था। हालांकि, लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय ने उन्हें दो सप्ताह की मोहलत दी थी। अब अतिरिक्त समय की मांग पर आगे का फैसला होना है।
20 सांसदों की सदस्यता पर टिकी निगाहें
इन 20 सांसदों के खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष अयोग्यता याचिकाएं दायर की गई हैं। हर सांसद के खिलाफ अलग शिकायत दर्ज कराई गई है। टीएमसी के ममता बनर्जी समर्थक गुट ने भी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय ने सांसदों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा।
टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी पहले दावा कर चुके हैं कि बागी सांसदों को एक साल के भीतर अयोग्य ठहराया जा सकता है और इसके बाद सभी 20 सीटों पर उपचुनाव कराने की नौबत आ सकती है। हालांकि, यह उनका दावा है और सांसदों की सदस्यता पर अंतिम फैसला संबंधित कानूनी प्रक्रिया के बाद ही होगा।
पूजा की मुलाकात या राजनीतिक रणनीति?
कोलकाता में हुई इस बैठक में एक ओर दुर्गा पूजा से पहले आपसी मेल-मिलाप की बात कही गई, तो दूसरी ओर सांसदों के संसदीय भविष्य से जुड़ा अहम मुद्दा भी सामने रहा। आधे सदस्यों की गैर-मौजूदगी ने भले ही गुट की एकजुटता को लेकर सवाल उठाए हों, लेकिन मौजूद सांसदों ने मतभेद की बात से इनकार किया है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि लोकसभा अध्यक्ष अतिरिक्त समय देने की मांग पर क्या फैसला लेते हैं और बागी सांसद अयोग्यता नोटिस के जवाब में क्या दलीलें पेश करते हैं। इन फैसलों का असर न केवल सांसदों की सदस्यता, बल्कि पश्चिम बंगाल की आगे की राजनीतिक तस्वीर पर भी पड़ सकता है।

