पाकिस्तान की दोहरी चुनौती: अफगानिस्तान में हवाई हमले, बलूचिस्तान और PoK में बढ़ता असंतोष
पाकिस्तान की दोहरी चुनौती: अफगानिस्तान में हवाई हमले, बलूचिस्तान और PoK में बढ़ता असंतोष
पाकिस्तान एक ओर अफगानिस्तान में हवाई और ड्रोन हमलों के जरिए तालिबान पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी ओर बलूचिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में राजनीतिक अधिकारों और मानवाधिकारों को लेकर विरोध का सामना कर रहा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इन क्षेत्रों में बढ़ते तनाव ने पाकिस्तान की सुरक्षा और क्षेत्रीय रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं।
अफगानिस्तान में पाकिस्तानी हमलों से बढ़ा तनाव
‘द डिप्लोमैट’ की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने अक्टूबर 2025 से सितंबर 2026 के बीच कम से कम 15 मौकों पर अफगानिस्तान के भीतर हवाई और ड्रोन हमले किए। हालिया घटनाक्रम में गुरुवार तड़के कुनार और हेलमंद प्रांतों में हमले किए जाने का दावा किया गया है।
तालिबान प्रशासन के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद के मुताबिक, इन हमलों में महिलाओं और बच्चों समेत नौ लोगों की मौत हुई, जबकि 11 अन्य घायल हो गए। उन्होंने तीन घरों के नष्ट होने की भी जानकारी दी। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि को लेकर जानकारी स्पष्ट नहीं है।
इससे पहले 24 सितंबर को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के अंदर 10 स्थानों पर हवाई और ड्रोन हमले किए थे। अफगान मीडिया के अनुसार, कंधार, खोस्त और पक्तिया प्रांत भी इन हमलों के निशाने पर थे।
वहीं, 21 सितंबर के हमलों में कुनार और पक्तिका प्रांतों में तीन नागरिकों की मौत की खबर सामने आई थी। पाकिस्तान ने अपनी कार्रवाई में 28 आतंकवादियों को मार गिराने का दावा किया था, जबकि संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन इन अफगानिस्तान (UNAMA) ने नागरिकों के हताहत होने की पुष्टि की थी। इन घटनाओं के बाद अफगानिस्तान के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए।
कोहाट हमले के बाद पाकिस्तान ने की कार्रवाई
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई को खैबर पख्तूनख्वा के कोहाट में पुलिस परिसर पर हुए हमले से भी जोड़कर देखा जा रहा है। 18 सितंबर को हुए इस हमले में कम से कम 16 पुलिसकर्मियों की मौत हुई थी।
हमले की जिम्मेदारी इत्तिहादुल मुजाहिदीन पाकिस्तान (IMP) ने ली थी। इस संगठन को हाफिज गुल बहादर समूह के नेतृत्व वाला गठबंधन बताया जाता है, जिसके तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से करीबी संबंध होने की जानकारी दी गई है। पाकिस्तानी अधिकारियों ने हमलावरों में से एक को अफगान नागरिक बताया था।
तालिबान पर दबाव बनाने की रणनीति पर सवाल
‘द डिप्लोमैट’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान का उद्देश्य केवल TTP और उससे जुड़े संगठनों की गतिविधियों को रोकना नहीं है, बल्कि अफगानिस्तान में अपना खोया हुआ रणनीतिक प्रभाव दोबारा हासिल करना भी हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, कभी पाकिस्तान का सहयोगी माना जाने वाला तालिबान अब इस्लामाबाद के लिए चुनौती बन गया है। ऐसे में हवाई हमलों और सैन्य दबाव के जरिए उसे झुकाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इस रणनीति के उलटे परिणाम सामने आने की आशंका भी जताई गई है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अफगानिस्तान में पिछले दो दशकों के अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप से यह सबक मिलता है कि लगातार सैन्य कार्रवाई से राजनीतिक समस्याओं का स्थायी समाधान निकालना मुश्किल हो सकता है।
बलूचिस्तान में दशकों पुराना विवाद
अफगानिस्तान के साथ तनाव के अलावा पाकिस्तान के भीतर बलूचिस्तान का संकट भी लगातार चर्चा में है। ‘यूरोपियन टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में संघर्ष की जड़ें राजनीतिक स्वायत्तता, प्रतिनिधित्व और प्राकृतिक गैस तथा खनिज संसाधनों पर नियंत्रण से जुड़े विवादों में हैं।
बलूचिस्तान का मौजूदा संघर्ष 21वीं सदी की शुरुआत में फिर तेज हुआ, हालांकि इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पाकिस्तान के शुरुआती वर्षों तक जाती है। वर्ष 1948 में कलात के पाकिस्तान में शामिल होने के बाद विद्रोह के कई दौर सामने आए। इनमें 1973 से 1977 के बीच का संघर्ष सबसे घातक दौरों में गिना जाता है।
ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में बलूचिस्तान का रणनीतिक महत्व भी बढ़ा है। इस क्षेत्र में राजनीतिक अधिकारों और संसाधनों के बंटवारे को लेकर असंतोष बना हुआ है।
लापता लोगों का मुद्दा बना बड़ी चिंता
रिपोर्ट में बलूचिस्तान में जबरन गायब किए जाने की घटनाओं और उनके परिवारों की परेशानी का भी उल्लेख किया गया है। बलूच कार्यकर्ता सम्मी दीन बलोच के पिता दीन मोहम्मद बलोच वर्ष 2009 में लापता हो गए थे। उस समय सम्मी दीन की उम्र 10 साल थी। इसके बाद उन्होंने लापता लोगों के परिवारों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2026 में कार्यकर्ता फौजिया बलोच के भाई दाद शाह भी कराची स्थित अपने घर से लापता हो गए। ऐसी घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका और जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
PoK में भी प्रतिबंध और विरोध प्रदर्शन
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी राजनीतिक अभिव्यक्ति और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंधों को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। रिपोर्ट में ह्यूमन राइट्स वॉच और संयुक्त राष्ट्र की पूर्व रिपोर्टों का हवाला देते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा करने के अधिकार और आतंकवाद विरोधी कानूनों के इस्तेमाल से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, 5 जून 2026 को पाकिस्तानी अधिकारियों ने आतंकवाद विरोधी कानून के तहत जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद प्रस्तावित विरोध प्रदर्शनों से पहले दूरसंचार सेवाओं में बाधा और गिरफ्तारियों की खबरें सामने आईं।
जून में PoK में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई झड़पों में मौतों और पुलिस कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठे। इन घटनाओं के बाद जांच और जवाबदेही की मांग तेज हुई।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रही जवाबदेही की मांग
‘यूरोपियन टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2026 में बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के समक्ष उठाए गए थे। इनमें जातीय और धार्मिक समुदायों के दमन से जुड़े आरोप भी शामिल थे।
कुल मिलाकर, अफगानिस्तान में सैन्य कार्रवाई, बलूचिस्तान में अलगाववादी संघर्ष और PoK में राजनीतिक अधिकारों को लेकर विवाद पाकिस्तान के सामने कई स्तरों पर चुनौतियां पेश कर रहे हैं। इन मामलों में मानवाधिकारों, राजनीतिक संवाद और जवाबदेही से जुड़े सवालों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
