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वट सावित्री व्रत आज: अखंड सौभाग्य के लिए महिलाएं रख रही हैं उपवास, जानें शुभ मुहूर्त और संपूर्ण व्रत कथा

वट सावित्री व्रत आज: अखंड सौभाग्य के लिए महिलाएं रख रही हैं उपवास, जानें शुभ मुहूर्त और संपूर्ण व्रत कथा

ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला सनातन धर्म का बेहद महत्वपूर्ण पर्व ‘वट सावित्री व्रत’ आज पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए आज निर्जला व्रत रख रही हैं। इस दिन वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा का विशेष विधान है, जिसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप माना जाता है।

​पूजा का शुभ मुहूर्त (Auspicious Timing)

​ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या तिथि को लेकर विशेष संयोग बन रहे हैं। पूजा के लिए निम्नलिखित समय सबसे श्रेष्ठ माना गया है:

​अमावस्या तिथि प्रारंभ: 15 मई को रात से ही अमावस्या तिथि का आगमन हो चुका है।

​अमावस्या तिथि समाप्त: 16 मई (आज) को पूरे दिन अमावस्या का प्रभाव रहेगा।

​पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त: सुबह 07:15 बजे से दोपहर 12:20 बजे तक।

​अमृत काल: सुबह 09:00 बजे से 10:30 बजे तक, जो पूजा के लिए अत्यंत फलदायी है।

​वट वृक्ष की पूजा का महत्व

​धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बरगद के पेड़ में साक्षात त्रिदेव का वास होता है। इसकी जड़ में ब्रह्मा, छाल में विष्णु और शाखाओं व पत्तियों में भगवान शिव का वास माना जाता है। महिलाएं आज के दिन वट वृक्ष की परिक्रमा कर उसके चारों ओर सूत का धागा (कच्चा सूत) लपेटती हैं और अपने वैवाहिक जीवन की रक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं।

​पौराणिक व्रत कथा: जब यमराज से पति के प्राण वापस ले आई सावित्री

​इस व्रत की मूल कथा मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री और उनके पति सत्यवान से जुड़ी है।

​कथा के मुख्य अंश:

सावित्री ने राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना था। विवाह के पूर्व देवर्षि नारद ने सचेत किया था कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु निश्चित है। इसके बावजूद सावित्री अपने पथ से नहीं डिगीं और उन्होंने सत्यवान से विवाह किया।

​जब आया सत्यवान का अंतिम समय

​विवाह का एक वर्ष पूरा होने पर, सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए। उनके साथ सावित्री भी गईं। जंगल में अचानक सत्यवान के सिर में तेज दर्द हुआ और वे वट वृक्ष के नीचे सावित्री की गोद में लेट गए। कुछ ही क्षणों में वहां प्राण हरने के लिए साक्षात यमराज प्रकट हुए और सत्यवान के सूक्ष्म शरीर को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए।

​सावित्री का साहस और यमराज का वरदान

​पतिव्रता सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ीं। यमराज ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया और कहा कि मृत्यु के बाद कोई वापस नहीं जा सकता। लेकिन सावित्री के पातिव्रत्य धर्म, बुद्धिमत्ता और तर्कों से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा (सत्यवान के प्राणों को छोड़कर)।

​पहला वरदान: सावित्री ने अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी और खोया हुआ राज्य वापस मांगा।

​दूसरा वरदान: उन्होंने अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का वरदान मांगा।

​तीसरा वरदान: अंत में सावित्री ने बड़ी चतुरता से अपने लिए ‘सौ पुत्रों की माता’ बनने का वरदान मांग लिया।

​यमराज को बदलना पड़ा निर्णय

​यमराज ने बिना सोचे-समझे ‘तथास्तु’ कह दिया। इसके बाद सावित्री ने यमराज को याद दिलाया कि एक पतिव्रता स्त्री के लिए अपने पति के बिना माता बनना कैसे संभव है? यमराज को अपनी भूल का अहसास हुआ और वे सावित्री की बुद्धिमत्ता और धर्मनिष्ठा के आगे नतमस्तक हो गए। विवश होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिए।

​सावित्री तुरंत उसी वट वृक्ष के पास लौटीं, जहां सत्यवान का मृत शरीर रखा था। वट वृक्ष की कृपा और सावित्री के तप से सत्यवान पुनर्जीवित हो उठे।

​पूजा की संक्षिप्त विधि

​सुबह स्नान कर नए वस्त्र (अधिमानतः लाल या पीले) धारण करें और श्रृंगार करें।

​बांस की टोकरी में सात प्रकार के अनाज (सप्तधान्य) रखें।

​वट वृक्ष के पास जाकर जल अर्पित करें, कुमकुम, अक्षत और फूल चढ़ाएं।

​भीगे हुए चने, पूड़ी और मिठाई का भोग लगाएं।

​सूती धागे को वट वृक्ष के चारों ओर 7, 11, 21 या 108 बार परिक्रमा करते हुए बांधें।

​हाथ में भीगा हुआ चना लेकर कथा सुनें और अंत में आरती कर बड़ों का आशीर्वाद लें।

​ब्यूरो रिपोर्ट, दैनिक समाचार।

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