उत्तराखंड

बनभूलपुरा हिंसा: सुप्रीम कोर्ट से उत्तराखंड सरकार को बड़ी जीत, मुख्य आरोपियों की जमानत रद्द, 2 हफ्ते में सरेंडर का आदेश

बनभूलपुरा हिंसा: सुप्रीम कोर्ट से उत्तराखंड सरकार को बड़ी जीत, मुख्य आरोपियों की जमानत रद्द, 2 हफ्ते में सरेंडर का आदेश

हल्द्वानी के बनभूलपुरा दंगे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज एक बड़ा फैसला सुनाते हुए उत्तराखंड सरकार को बड़ी कानूनी राहत दी है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने नैनीताल हाई कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत मुख्य आरोपी जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब को ‘डिफॉल्ट जमानत’ दी गई थी।

​न्यायालय ने दोनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण (Surrender) करने के निर्देश दिए हैं। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि यदि आरोपी समय पर सरेंडर नहीं करते हैं, तो ट्रायल कोर्ट उन्हें हिरासत में लेने के लिए सख्त कदम उठाए।

​सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बताया ‘गलत’

​राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नैनीताल हाई कोर्ट के रुख पर कड़ी नाराजगी जताई।

​हाई कोर्ट की टिप्पणी अनुचित: शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट इस मामले में पूरी तरह गलत दिशा में गया। जांच प्रक्रिया और गवाहों के बयान दर्ज करने को लेकर हाई कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियां तथ्यात्मक रूप से गलत और अनुचित थीं।

​जांच एजेंसी की सराहना: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि घटना की गंभीरता, आरोपियों की बड़ी संख्या और सैकड़ों गवाहों के बावजूद जांच एजेंसी ने अत्यंत तेजी और दक्षता के साथ काम किया।

​अधिकार खो चुके थे आरोपी: न्यायालय ने कहा कि आरोपियों ने समय विस्तार और जमानत खारिज होने के आदेश को समय रहते चुनौती नहीं दी, बल्कि दो महीने तक इंतजार किया। ऐसे आचरण के कारण वे डिफॉल्ट जमानत का अधिकार खो चुके थे।

​क्या था बनभूलपुरा दंगा मामला?

​यह मामला 8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा में हुए हिंसक दंगों से जुड़ा है। अतिक्रमण विरोधी अभियान के दौरान उग्र भीड़ ने:

​पुलिस बल पर अंधाधुंध पथराव, फायरिंग और पेट्रोल बम से हमला किया।

​पुलिस वाहनों को आग के हवाले कर दिया।

​महिला कांस्टेबलों को पुलिस स्टेशन के भीतर बंद कर थाने में आग लगा दी।

​इस जघन्य कृत्य के लिए आरोपियों पर UAPA (धारा 15 व 16), आर्म्स एक्ट और भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं के तहत तीन अलग-अलग FIR दर्ज की गई थीं।

​राज्य सरकार की बड़ी कानूनी जीत

​सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार का पक्ष उप महाधिवक्ता श्री जतिंदर कुमार सेठी और स्टैंडिंग काउंसिल श्री आशुतोष कुमार शर्मा ने रखा। राज्य अभियोजन विभाग इस फैसले को एक बड़ी जीत मान रहा है।

​यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसमें कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली मशीनरी (पुलिस) को ही सीधे तौर पर निशाना बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जांच की सराहना किए जाने से उत्तराखंड पुलिस विभाग का मनोबल बढ़ा है और यह संदेश गया है कि दंगाइयों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति जारी रहेगी।

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