कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक साकेत बडोला ने लिया वीआरएस, आईएफएस अधिकारियों के समय से पहले इस्तीफे पर उठे सवाल
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक साकेत बडोला ने लिया वीआरएस, आईएफएस अधिकारियों के समय से पहले इस्तीफे पर उठे सवाल
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक और भारतीय वन सेवा (IFS) के वरिष्ठ अधिकारी साकेत बडोला ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने की घोषणा कर दी है। पौड़ी गढ़वाल के कोटद्वार निवासी और एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले बडोला ने शुक्रवार को सोशल मीडिया पर एक भावुक संदेश साझा करते हुए महीनों के गंभीर मंथन के बाद ‘निजी कारणों’ से यह कदम उठाने की बात कही। हालांकि, उनके इस अचानक फैसले ने एक बार फिर प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा छेड़ दी है कि आखिर उत्तराखंड के शीर्ष वन अधिकारी समय से पहले सेवा क्यों छोड़ रहे हैं।
आईएफएस अधिकारियों के इस्तीफे की लंबी होती फेहरिस्त
साकेत बडोला का यह फैसला अकेला नहीं है, बल्कि उत्तराखंड वन विभाग में पिछले कुछ समय में ऐसे कई मामले सामने आए हैं:
डॉ. धनंजय मोहन: राज्य वन विभाग के सर्वोच्च पद (प्रमुख वन संरक्षक – HoFF) पर तैनात रहे डॉ. धनंजय मोहन ने जून 2025 में अपनी सेवानिवृत्ति से कुछ समय पहले पारिवारिक कारणों का हवाला देकर अचानक वीआरएस ले लिया था।
मनोज चंद्रन: ईमानदार छवि के माने जाने वाले आईएफएस अधिकारी मनोज चंद्रन ने भी अक्टूबर 2024 में पारिवारिक समस्याओं का हवाला देते हुए वीआरएस का आवेदन दिया था। उनके कार्यकाल के दौरान नियम विरुद्ध प्रमोशन और विभागीय चार्जशीट जैसे मामले भी चर्चा में रहे थे।
कागजी कारणों के पीछे छिपी असलियत?
भલે ही आधिकारिक दस्तावेजों और आवेदनों में वीआरएस का कारण ‘पारिवारिक’ या ‘निजी’ दर्ज किया जाता हो, लेकिन नौकरशाही के जानकारों का मानना है कि इसके पीछे प्रशासनिक दबाव, नीतिगत निर्णयों और राजनीतिक तालमेल जैसी कई परतें जुड़ी हो सकती हैं। संवेदनशील और अति-महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करने वाले ईमानदार अधिकारियों को अक्सर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके भीतर निराशा पनपना स्वाभाविक माना जाता है।
उत्तराखंड जैसे वनाच्छादित राज्य में, जहां 70% से अधिक भू-भाग वनों से घिरा है, वहां शीर्ष वन अधिकारियों का इस तरह असमय सेवा छोड़ना पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के भविष्य पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि शासन-प्रशासन इन लगातार होते त्यागपत्रों पर क्या रुख अपनाता है।

