संसद का सत्रावसान न होने पर सियासी घमासान, खरगे को रिजिजू का जवाब- यह असंवैधानिक नहीं
संसद का सत्रावसान न होने पर सियासी घमासान, खरगे को रिजिजू का जवाब- यह असंवैधानिक नहीं
संसद का मॉनसून सत्र समाप्त होने के करीब दो महीने बाद भी सत्रावसान नहीं किए जाने का मुद्दा गरमा गया है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक सत्रावसान नहीं करना असंवैधानिक या प्रक्रियात्मक अनियमितता नहीं है। उन्होंने इसके समर्थन में संसद के पुराने उदाहरण भी दिए।
दरअसल, मीडिया में ऐसी खबरें सामने आई थीं कि सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए जल्द ही संसद का विशेष सत्र बुला सकती है। इसके बाद मल्लिकार्जुन खरगे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर परिसीमन विधेयक के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी। अब रिजिजू ने पत्र के जरिए उनकी आपत्तियों का जवाब दिया है।
रिजिजू ने पुराने संसदीय उदाहरणों का दिया हवाला
मल्लिकार्जुन खरगे ने आपत्ति जताई थी कि 13 अगस्त 2026 को संसद की कार्यवाही स्थगित होने के बाद 64 दिन बीत जाने के बावजूद सत्रावसान नहीं किया गया। इस पर रिजिजू ने कहा कि ऐसी स्थिति पहले भी बन चुकी है और इसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
रिजिजू के मुताबिक, वर्ष 2008 में लोकसभा को अनिश्चित काल के लिए स्थगित किए जाने के बाद 87 दिनों तक सत्रावसान नहीं हुआ था। इसके अलावा 1987 में 76 दिन, 1989 में 54 दिन और 2013 में 49 दिनों तक भी ऐसी स्थिति रही थी।
इन उदाहरणों के जरिए संसदीय कार्य मंत्री ने तर्क दिया कि संसद का सत्रावसान लंबे समय तक लंबित रहना अपने आप में संवैधानिक या प्रक्रियात्मक उल्लंघन नहीं है।
राहुल गांधी और कांग्रेस से भी मांगा था सहयोग
रिजिजू ने अपने पत्र में कहा कि सरकार परिसीमन संशोधन विधेयक पर समर्थन और सहयोग जुटाने के लिए कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों से लगातार संपर्क करती रही है।
उन्होंने बताया कि मल्लिकार्जुन खरगे को 16 मार्च, 26 मार्च और 12 अप्रैल 2026 को पत्र लिखे गए थे। इसके अलावा उनसे व्यक्तिगत रूप से भी चर्चा की गई थी। मॉनसून सत्र के दौरान उन्होंने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात कर इस मुद्दे पर सहयोग मांगा था।
रिजिजू के अनुसार, कांग्रेस की ओर से चर्चा के लिए तारीखें तय नहीं किए जाने के बाद सरकार ने दूसरे राजनीतिक दलों से संपर्क साधा।
कई विपक्षी दलों से भी हुई चर्चा
संसदीय कार्य मंत्री ने बताया कि व्यापक सहमति बनाने के उद्देश्य से डीएमके, समाजवादी पार्टी, वाईएसआरसीपी, एनसीपी, शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजेडी के प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श किया गया।
रिजिजू ने कहा कि सरकार संवाद के लिए ठोस प्रयास कर चुकी है। ऐसे में बार-बार सर्वदलीय बैठक की मांग दोहराना समझ से परे है। उन्होंने कांग्रेस से अपील की कि वह भविष्य के महत्वपूर्ण विधेयकों के रास्ते में बाधा डालने के बजाय रचनात्मक भूमिका निभाए।
परिसीमन और महिला आरक्षण पर टिकी नजरें
संसद के सत्रावसान को लेकर उठा विवाद अब परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संभावित संवैधानिक संशोधनों की चर्चा से भी जुड़ गया है। जहां खरगे ने परिसीमन के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक की मांग की है, वहीं सरकार का कहना है कि वह विपक्षी दलों के साथ सहमति बनाने के लिए पहले ही प्रयास कर चुकी है।
इस मुद्दे पर आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार और विपक्ष के बीच संवाद किस दिशा में बढ़ता है और क्या प्रस्तावित विधायी बदलावों को लेकर व्यापक सहमति बन पाती है।

