फिल्म समीक्षा: ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ – न्याय की अनकही और लंबी लड़ाई का सधा हुआ दस्तावेज
फिल्म समीक्षा: ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ – न्याय की अनकही और लंबी लड़ाई का सधा हुआ दस्तावेज
निर्देशक: अविनाश अरुण
कलाकार: राजकुमार राव, वामिका गब्बी, ललित प्रभाकर, जयदीप अहलावत, सिकंदर खेर, आशीष विद्यार्थी
अवधि: 140 मिनट
रेटिंग: 4.5/5
हम सभी को 26/11 की वह भयावह रात आज भी याद है—मुंबई पर हुए आतंकी हमले की तस्वीरें, डर, बेबसी और अपनों को खोने का दर्द आज भी हमारी सामूहिक स्मृति में दर्ज है। लेकिन उस त्रासदी के बाद की कहानी से कितने लोग वाकिफ हैं? कैमरों के वहां से हट जाने के बाद शुरू हुई लंबी कानूनी लड़ाई, न्याय की तलाश और उन लोगों के संघर्ष की दास्तान को पर्दे पर उतारती है अविनाश अरुण के निर्देशन में बनी फिल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’।
कथा-सार और दृष्टिकोण
उज्ज्वल निकम से जुड़ी यह प्रसिद्ध पंक्ति—‘जल्दबाजी में मिला न्याय, न्याय को दफन करने जैसा है’—इस फिल्म के मूल सार को बखूबी बयां करती है। फिल्म हमें 26/11 की उस रात से आगे ले जाकर अदालत के भीतर लड़ी गई उस कानूनी जंग से रूबरू कराती है, जहाँ अजमल कसाब के मुकदमे के साथ-साथ 1993 के मुंबई बम धमाकों के मामले को भी छुआ गया है।
यह फिल्म केवल कोर्टरूम की बहसों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यक्ति के निजी जीवन और त्याग को भी सामने रखती है, जिसके पेशे में सामान्य पारिवारिक जीवन के लिए शायद ही कोई जगह बचती है।
अभिनय पक्ष: कलाकारों की दमदार प्रस्तुतियां
राजकुमार राव (उज्ज्वल निकम): राजकुमार राव इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनका अभिनय संयम पर आधारित है। वह हर बात को किसी नाटकीय घोषणा में नहीं बदलते, बल्कि उनके हाव-भाव, संवाद अदायगी और अदालत में उनकी मजबूत मौजूदगी सब कुछ बेहद सधा हुआ लगता है। उन्होंने निकम के पेशेवर दृढ़ विश्वास और एक पिता के रूप में उनके भीतर के संघर्ष को बेहतरीन तरीके से उभारा है।
ललित प्रभाकर (अजमल कसाब): कसाब के किरदार में ललित प्रभाकर ने एक मजबूत और बेचैन करने वाला प्रभाव छोड़ा है। फिल्म के अंत की ओर उनका इकबालिया बयान लंबे समय तक दर्शक के मन में बना रहता है।
सहायक कलाकार: सिकंदर खेर (बचाव पक्ष के वकील) ने गंभीरता और संयम दिखाया है, जबकि जयदीप अहलावत (पाकिस्तानी सरकारी अभियोजक) अपने किरदार को कई परतों के साथ प्रभावशाली ढंग से पेश करते हैं। वामिका गब्बी (ज्योति निकम) ने एक व्यस्त पेशेवर जिंदगी जीने वाले शख्स के परिवार की भावनात्मक गर्माहट को पर्दे पर उतारा है। इसके अलावा, आशीष विद्यार्थी ने न्यायमूर्ति एम. एल. तहिलियानी के रूप में अदालती कार्यवाही को आवश्यक गंभीरता प्रदान की है।
निजी और पेशेवर जीवन का संतुलन
फिल्म का एक सबसे भावनात्मक पहलू उज्ज्वल निकम और उनके बेटे अनिकेत का रिश्ता है। निकम अपने मामलों में इतने व्यस्त रहते हैं कि पारिवारिक जीवन पीछे छूट जाता है। जब अनिकेत कानून की पढ़ाई पूरी कर अपने पिता के साथ इंटर्न के रूप में जुड़ता है, तो उसे पिता से विशेष स्नेह की उम्मीद होती है, लेकिन निकम उसे किसी अन्य कनिष्ठ सहयोगी की तरह ही ट्रीट करते हैं। अदालत के कड़े अनुशासन और घर की अनकही चाह के बीच की यह खींचतान फिल्म को बेहद मानवीय और गहराई से परिपूर्ण बनाती है।
निर्देशन, लेखन और तकनीकी पक्ष
अविनाश अरुण का निर्देशन बेहद संतुलित और भरोसेमंद है। वह अनावश्यक रूप से भावनाओं का अति-नाटकीयकरण करने से बचते हैं और कानूनी प्रक्रिया को ही तनाव पैदा करने का माध्यम बनाते हैं। फिल्म की लेखनी कसी हुई है; अदालत के दृश्य दलीलों, सबूतों और न्याय की तलाश पर पूरी तरह केंद्रित रहते हैं। बैकग्राउंड स्कोर भी बेहद सधा हुआ है, जो महत्वपूर्ण बहसों में तनाव बढ़ाता है लेकिन कभी भी कलाकारों के अभिनय पर हावी नहीं होता।
निष्कर्ष
दिनेश विजान के निर्माण में मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले बनी ‘प्रहार’ एक वास्तविक कानूनी लड़ाई और राष्ट्रीय त्रासदी के बाद जवाबदेही सुनिश्चित करने की कठिन प्रक्रिया पर गहराई से ध्यान केंद्रित करती है। यह फिल्म याद दिलाती है कि न्याय रातोंरात नहीं मिलता और इसे हासिल करने के लिए ऐसे त्याग करने पड़ते हैं जो अक्सर दुनिया की नजरों से ओझल रहते हैं। अपने बेहतरीन अभिनय, भावनात्मक गहराई और कसे हुए निर्देशन के कारण यह एक अनिवार्य रूप से देखने लायक कोर्टरूम ड्रामा है।

