फॉर्म-6 में बिना कानूनी संशोधन के बदलाव: चुनाव आयोग के अंदर असहमति और विपक्ष का गुस्सा
फॉर्म-6 में बिना कानूनी संशोधन के बदलाव: चुनाव आयोग के अंदर असहमति और विपक्ष का गुस्सा
चुनाव आयोग में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर गहरे मतभेद सामने आए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट (23 सितंबर 2026) ने खुलासा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए गए कई फैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई। इनमें सबसे प्रमुख मुद्दा फॉर्म-6 में बदलाव का है, जिसने नए मतदाताओं के पंजीकरण को प्रभावित किया।
फॉर्म-6 क्या है और क्या बदलाव हुआ?
फॉर्म-6 वह वैधानिक आवेदन पत्र है जिसके जरिए कोई भी पात्र नागरिक पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवाता है। यह Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित है। नियमों में कोई बदलाव सरकार की अधिसूचना और गजट नोटिफिकेशन के बिना नहीं हो सकता।
जुलाई 2026 में ECINET पोर्टल पर उपलब्ध ऑनलाइन फॉर्म-6 में एक नया ‘घोषणा’ सेक्शन जोड़ा गया। इसमें आवेदक से पूछा गया:
क्या उसका नाम पिछले SIR (2000 के दशक की शुरुआत) की मतदाता सूची में था?
या उसके माता-पिता/दादा-दादी का नाम उस सूची में था?
या न तो उसका और न ही उसके माता-पिता का नाम था?
यह सेक्शन अनिवार्य नहीं बताया गया था, लेकिन बिना जवाब दिए फॉर्म जमा नहीं हो पाता था। ऑफलाइन फॉर्म में यह बदलाव नहीं था। आलोचकों का कहना है कि इससे पहली बार वोट डालने वाले युवाओं को अतिरिक्त बाधा का सामना करना पड़ सकता है।
चुनाव आयुक्तों की असहमति: क्या कहा गया?
16 मई 2026: विवेक जोशी ने फाइल पर लिखा कि फॉर्म-6 वैधानिक दस्तावेज है। SIR के आदेश या दिशानिर्देशों से इसे नहीं बदला जा सकता। “कानूनी रूप से टिकाऊ रास्ता” यही है कि प्रस्ताव सरकार को भेजा जाए ताकि नियम संशोधित हों। संधू ने 19 मई को इस राय से सहमति जताई।
बदलाव फिर भी लागू किया गया।
13 अगस्त 2026: इंडियन एक्सप्रेस की जुलाई रिपोर्ट के बाद संधू ने लिखित रूप में कहा कि यह बदलाव “अनधिकृत और गैरकानूनी” (unauthorised and illegal) है। उन्होंने तुरंत हटाने की मांग की ताकि पात्र युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाता बिना परेशानी के नाम दर्ज करवा सकें। रिपोर्ट के समय (सितंबर 2026) तक यह सवाल फॉर्म में मौजूद था।
दोनों आयुक्तों ने अन्य मुद्दों पर भी आपत्ति जताई—मतदाता सूची से नाम हटाना/जोड़ना, अपील प्रक्रिया, वोटर डेटाबेस का केंद्रीकरण और फील्ड अधिकारियों की ECINET तक पहुंच कम होना। उन्होंने कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखा था।
चुनाव आयोग का जवाब
आयोग के सूत्रों और प्रेस नोट में कहा गया कि SIR सहित सभी फैसले तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए। मतभेद सामान्य चर्चा का हिस्सा हैं, औपचारिक असहमति नहीं। आयोग ने दावा किया कि कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय बिना मंजूरी के नहीं लिया गया।
विपक्ष का गुस्सा: कौन क्या बोला?
रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने तीखा हमला बोला:
कांग्रेस: राहुल गांधी और अन्य नेताओं ने इसे “वोट चोरी” और “अदृश्य हाथ” से आयोग चलाने का आरोप लगाया। मनीष तिवारी ने कहा कि दो आयुक्तों को महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी तक नहीं दी जा रही। इस्तीफे की मांग उठी।
राजद सांसद मनोज झा: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा मांगा। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट से साफ है कि आयोग अपनी मर्जी से फैसले ले रहा है।
टीएमसी: डेरेक ओ’ब्रायन और अन्य ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राज्यसभा में लंबित महाभियोग प्रस्ताव आगे बढ़ाने की बात कही।
कपिल सिब्बल: फॉर्म-6 में बदलाव, डेटा केंद्रीकरण और SIR के दायरे पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने और प्रक्रिया रोकने की मांग की।
अखिलेश यादव और अन्य नेताओं ने भी आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त की प्रतिक्रिया
पूर्व CEC ओ.पी. रावत ने बदलाव को “बिल्कुल गलत और अवैध” बताया। उन्होंने कहा कि वैधानिक फॉर्म को नियम संशोधन के बिना बदलना गंभीर मामला है। आयोग के अंदर मतभेद “बहुत गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण” हैं, जिससे जनता का भरोसा और कमजोर हो सकता है।
क्यों है यह विवाद महत्वपूर्ण?
फॉर्म-6 सिर्फ कागजी प्रक्रिया नहीं है। यह नए मतदाताओं—खासकर युवाओं—के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा है। कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने का आरोप आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। SIR के तहत पहले ही करोड़ों नामों को प्रभावित किया जा चुका है। आयोग के अंदर इतनी लिखित आपत्तियां पहले कभी इतने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक नहीं हुईं।
यह मामला अभी भी विकसित हो रहा है। आयोग ने अपनी स्थिति दोहराई है, जबकि विपक्ष और पूर्व अधिकारियों ने पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया पर जोर दिया है। मतदाता सूची की शुद्धता और निष्पक्षता दोनों ही लोकतंत्र की बुनियाद हैं—इस विवाद ने इन्हीं सवालों को फिर से केंद्र में ला दिया है।
